कवि दलीचंद जांगिड़: वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप
अरे हल्दीघाटी री माटी बोलै है,
चेतक री टापां आज भी डोलै है,
कुण कहवै राणा हार’र गयो,
अरे वो तो अमर हो’र मेवाड़ रो सूरज बनग्यो।
जद अकबर रो मान घट्यो,
जद दिल्ली रो तखत हिलग्यो,
उण दिन एकलिंग रै लाल नै
मेवाड़ री आजादी सारू तलवार उठाई।
घास री रोटी खाई,
भूखा सोया वन-वन में,
पण मुगलां आगै शीश नीं झुकायो,
यो प्रण लियो राणा निडर मन में।
चेतक उड़तो जाणै पवन हो,
नाला कूदतो जाणै सपनो हो,
स्वामी सारू प्राण तज दिया,
पण पीठ नीं दिखाई रण में।
भीलां रै संग भील बणग्यो,
पहाड़ां में सिंह ज्यूं गरजग्यो,
अकबर कहवतो – “मान जाओ राणा”,
राणा कहवतो – “मेवाड़ आजाद रैसी राणा”।
नैणां में ज्वाला, हाथ में भालो,
माथै मेवाड़ी पाग रो लालो,
राणा रो नाम सुण’र बैरी थर-थर कांपै,
आज भी दुश्मन रो कलेजो कांपै।
कुण कहवै इतिहास बदलग्यो,
राणा रो यश अमर होग्यो,
जब लग सूरज चाँद रैसी,
राणा थारी कीरत गाई जैसी।
धन्य धन्य वो मेवाड़ी माटी,
जिण जायो ऐसो लाल,
खौड सूं ले’र सातारा तक,
हर जांगिड़ बोलै – “जय महाराणा प्रताप”।।
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जय मेवाड़, जय राजपुताना
लेखक: दलीचंद जांगिड़ खौड (पाली) राजस्थान
