राजनीतिक संदेश, एक्शन और भावनाओं का मिश्रण दर्शकों को पूरी तरह प्रभावित करने में असफल: विजय ने निभाया यादगार किरदार
तमिलनाडु। दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार विजय की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘जन नायक’ आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। यह फिल्म विजय के तीन दशक लंबे फिल्मी करियर की अंतिम फिल्म मानी जा रही है। खास बात यह है कि फिल्म के रिलीज होने तक विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जिससे इस फिल्म का महत्व और भी बढ़ गया। दर्शकों को उम्मीद थी कि यह फिल्म विजय के शानदार करियर को यादगार विदाई देगी, लेकिन फिल्म उस स्तर पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी।
फिल्म का निर्देशन एच. विनोद ने किया है। इसकी कहानी पूर्व पुलिस अधिकारी वेत्री कोंडन के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी भूमिका विजय ने निभाई है। वह एक युवती की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय हथियार तस्कर फीनिक्स से भिड़ता है। फिल्म में लोकतंत्र, सत्ता का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार और आधुनिक युद्ध जैसे विषयों को जोड़ने का प्रयास किया गया है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत विजय का अभिनय है। उन्होंने अपने प्रशंसकों की उम्मीदों के अनुरूप दमदार अभिनय किया है। भावनात्मक दृश्यों से लेकर एक्शन तक हर जगह उनकी स्क्रीन उपस्थिति प्रभावशाली नजर आती है। कई दृश्यों में उनका अभिनय दर्शकों को भावुक भी करता है।
अभिनेत्री ममिता बैजू ने भी अपने किरदार में प्रभाव छोड़ा है। वहीं पूजा हेगड़े को सीमित अवसर मिले हैं। प्रकाश राज और गौतम वासुदेव मेनन ने सहायक भूमिकाओं में अच्छा काम किया है। दूसरी ओर, बॉबी देओल का खलनायक वाला किरदार प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाता। उनके चरित्र को जितना खतरनाक दिखाने की कोशिश की गई, उतना असर पर्दे पर दिखाई नहीं देता।
फिल्म के तकनीकी पक्ष की बात करें तो संगीतकार अनिरुद्ध रविचंदर का पृष्ठभूमि संगीत इसकी सबसे मजबूत कड़ी है। कई कमजोर दृश्यों को भी उनका संगीत प्रभावशाली बना देता है। सिनेमैटोग्राफी कुछ स्थानों पर आकर्षक है, लेकिन दृश्य प्रभाव (वीएफएक्स) बड़े बजट की फिल्म के अनुरूप नजर नहीं आते। कई दृश्य अधूरे और कृत्रिम प्रतीत होते हैं।
लगभग तीन घंटे से अधिक की अवधि फिल्म की गति को प्रभावित करती है। विशेष रूप से दूसरे भाग में कहानी कई उपकथाओं में उलझ जाती है, जिससे दर्शकों की रुचि कुछ कम होती है। फिल्म लोकतंत्र और जनसेवा का संदेश देने का प्रयास करती है, लेकिन कई संवाद अत्यधिक सीधे और भाषण जैसे लगते हैं।
फिल्म में विजय को एक आदर्श जननेता के रूप में प्रस्तुत करने का भरपूर प्रयास किया गया है। हालांकि, कई समीक्षकों का मानना है कि यदि कहानी और पटकथा पर अधिक ध्यान दिया जाता तो यह फिल्म विजय के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हो सकती थी।
कुल मिलाकर ‘जन नायक’ विजय के शानदार अभिनय और प्रभावशाली स्क्रीन उपस्थिति के कारण एक बार जरूर देखी जा सकती है। हालांकि कमजोर पटकथा, लंबी अवधि और साधारण वीएफएक्स इसे उत्कृष्ट फिल्म बनने से रोकते हैं। विजय के प्रशंसकों के लिए यह भावनात्मक विदाई है, लेकिन एक यादगार अंतिम फिल्म बनने का अवसर फिल्म पूरी तरह भुना नहीं सकी।
