लंबी जंग की तैयारी: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली रक्षा रणनीति, हथियार खरीद पर रिकॉर्ड निवेश
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक 2025-26 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपए पहुंच गया।
नई दिल्ली। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा तैयारियों और हथियार खरीद नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रक्षा मंत्रालय और रक्षा अधिग्रहण परिषद के हालिया निर्णयों से संकेत मिलते हैं कि अब भारतीय सशस्त्र बलों को केवल सीमित जवाबी कार्रवाई के बजाय लंबे समय तक चलने वाले और बहुस्तरीय सैन्य संघर्षों के लिए तैयार किया जा रहा है। इसी दिशा में पिछले 14 महीनों के दौरान रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 55 रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी है, जिनकी कुल अनुमानित लागत 9.80 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
यह राशि एकमुश्त खर्च नहीं की जाएगी, बल्कि आने वाले वर्षों में विभिन्न रक्षा परियोजनाओं, हथियारों की खरीद, स्वदेशी निर्माण और सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रमों पर चरणबद्ध तरीके से निवेश किया जाएगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन और पश्चिम एशिया में लंबे समय से चल रहे युद्धों ने भारत की रक्षा रणनीति को प्रभावित किया है। अब सेना की प्राथमिकता केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि लंबे समय तक युद्ध लड़ने की क्षमता, तेज मरम्मत व्यवस्था, पर्याप्त गोला-बारूद और मजबूत रसद तंत्र विकसित करना भी है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, लॉयटरिंग म्यूनिशन और नेत्र निगरानी प्रणाली जैसे स्वदेशी रक्षा उपकरणों के प्रभावी उपयोग के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग भी बढ़ी है। कई देशों ने इन प्रणालियों में रुचि दिखाई है और हजारों करोड़ रुपये के रक्षा सौदे पहले ही हो चुके हैं।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 62 प्रतिशत अधिक है। ब्रह्मोस मिसाइल के लिए फिलीपींस, वियतनाम सहित कई देशों के साथ लगभग 12,500 करोड़ रुपये के समझौते हो चुके हैं, जबकि इंडोनेशिया के साथ करीब 3,600 करोड़ रुपये का सौदा अंतिम चरण में है। वहीं, आर्मेनिया के साथ आकाश मिसाइल प्रणाली की 6,100 करोड़ रुपये की डील पहले ही पूरी हो चुकी है।
वर्तमान में भारत 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। सरकार ने वर्ष 2029-30 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्ष 2016-17 में यह आंकड़ा केवल 1,522 करोड़ रुपये था। इससे स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में भारत रक्षा उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा है।
