June 18, 2026

सत्यपाल वत्स आर्य: पंच महायज्ञ जीवन में सुख, शांति और संस्कारों का मार्ग

Panch Mahayajna: The Path to Happiness, Peace, and Virtues in Life

सत्यपाल वत्स आर्य।

पंच महायज्ञ

परमपिता परमात्मा ने सबसे सुंदर जीव मनुष्य की रचना की है। इसको बोलने की, समझने की, हंसने की कला दी है। मनुष्य को परमात्मा ने सबसे मुख्य बुद्धि दी है। जब परमात्मा ने मनुष्य को इतना सुंदर शरीर दिया है और इतनी विशाल बुद्धि, सोचने की शक्ति, समझने की शक्ति, देखने की शक्ति, सुनने की शक्ति, कार्य करने की शक्ति दी है ,तो मनुष्य का भी कुछ कर्तव्य बनता है कि ईस दुनिया में आकर समाज के लिए,परिवार के लिए, राष्ट्र के लिए, अपने लिए कुछ उत्तम कर्म करें । वह उत्तम कर्म स्वामी दयानंद जी ने पंच महायज्ञ के नाम से बताएं हैं जो इस प्रकार है:—

ब्रह्मयज्ञ:—-

परमपिता परमात्मा ने यह सुंदर शरीर बनाया , इसकी जीविका के लिए सारे साधन जुटाए हैं । खाने के ,पीने के, ओढ़ने के, पहनने के, यह सभी कुछ उस परमात्मा ने ही देन है। कोई किसी को एक छोटी सी चीज, जैसे कि एक पेन भी देता है तो उसको धन्यवाद बोला जाता है । जिस परमपिता परमात्मा ने सब कुछ दिया है, तो हमारा भी दायित्व बनता है कि उस परमपिता परमात्मा को सुबह शाम संध्या के द्वारा उसका सिमरण करें, उसका धन्यवाद करें । प्रतिदिन सुबह शाम धन्यवाद करते हुए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करें । इसको ही ब्रह्मयज्ञ कहते हैं। इससे बुद्धि, आत्मिक ज्ञान, आत्मिक शान्ति और आत्मिक बल बढ़ता है। प्रत्येक मनुष्य को ब्रह्मयज्ञ का पालन करना चाहिए। यह उसका नैतिक कर्तव्य है।

देवयज्ञ:—

प्रतिदिन शुद्ध घी, जड़ी-बूटियों और हवन सामग्री द्वारा अग्निहोत्र (हवन) करने को देवयज्ञ कहा जाता है । इससे वातावरण शुद्ध होता है, रोगों का नाश होता है बच्चों में अच्छे संस्कार पैदा होते हैं और पर्यावरण को भी लाभ मिलता है। देवयज्ञ क्यों करना चाहिए इसलिए कि हम सारा दिन शरीर के द्वारा जैसे:– पसीने के द्वारा, स्वांस के द्वारा, मल मूत्र के द्वारा, वायुमंडल को दूषित करते रहते हैं तो हमारा भी नैतिक कर्तव्य बनता है की प्रतिदिन यज्ञ करके, जिस वायुमंडल में हम स्वांस लेते हैं उसको शुद्ध करें । जैसे प्रतिदिन अपने घर की सफाई रखते हैं, मंदिर की सफाई रखते हैं, शरीर की सफाई रखते हैं, इसी प्रकार दैनिक यज्ञ करके वायुमंडल को भी शुद्ध करें तो हमें और आम जनता को सांस लेने में तकलीफ नहीं होगी, हमें शुद्ध वायुमंडल मिलेगा। प्रतिदिन देनिक यज्ञ करना हमारा नैतिक कर्तव्य बनता है। जिसका हमें पालन करना चाहिए।

पितृयज्ञ:—-

अपने जीवित माता-पिता, सास ससुर, दादा दादी, गुरुजनों, वृद्धों और विद्वानों की सेवा, सत्कार और सम्मान करना पितृयज्ञ कहलाता है । जिन्होंने हमें जन्म दिया और ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह माध्यम है। जो 1 वर्ष में 15 दिन श्राद्ध निकालते हैं वह निकाले या ना निकाले कोई पाप नहीं लगता, लेकिन जीवित माता-पिता बुजुर्गों के आंखों में आंसू आ गए तो महापाप लगेगा। बुजुर्गों की सेवा करने का सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि हमारी संतान यह सब कुछ देखती है तो आगे जाकर हमें भी उसका लाभ मिलेगा वह हमारी सेवा करेंगे। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है की आत्मा मरती नहीं है वह समय आने पर चोला बदलती है । जो माता-पिता हमारे से विदा हो गए, उन्होंने नया शरीर कर्म अनुसार धारण कर लिया , इसके बाद वह फिर से हमारा भोजन ग्रहण करने नहीं आएंगे। हम उनकी पुण्यतिथि पर यज्ञ ( हवन ) करा कर उनको याद कर सकते हैं उनकी याद में गरीबों को दान कर सकते हैं।

बलिवैश्वदेव यज्ञ :—-

मनु महाराज ने मनुस्मृति में आदमी के जीवन को चार भागों में बांटा है, जिनको आश्रम कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम, ग्रहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम। इन चारों आश्रमों में सबसे मुख्य ग्रहस्थ आश्रम को माना गया है। गृहस्थी का कर्तव्य है कि वह पक्षियों, चीटियों, गायों और अन्य बेजुबान जानवरों ,प्राणियों और इनके साथ दादा-दादी, माता-पिता, सास-ससुर के लिए भोजन और जल की व्यवस्था करना बलिवैश्वदेव यज्ञ कहलाता है । यह समस्त जीवों के प्रति प्रेम और करुणा की भावना को दर्शाता है। इस यज्ञ का पालन करना गृहस्थी का नैतिक कर्तव्य है।

अतिथि यज्ञ:—

परिवारिक घर में जो आदमी बिना तिथि के आए उसको अतिथि कहते हैं जैसे:-घर आए हुए विद्वान, संन्यासी, धार्मिक और परोपकारी अतिथियों का सत्कार और सेवा करना अतिथि यज्ञ है। इससे सामाजिक सद्भाव और अतिथि सत्कार की भावना प्रबल होती है। जिस घर में अतिथि आते हैं और उनका वहां पर पूरा मान सम्मान होता है। जब वह अतिथि बाहर जाकर उस परिवार की प्रशंसा करते हैं तो उस परिवार का बल, बुद्धि और यश बढ़ता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य बनता है अतिथि यज्ञ का पूरी तरह पालन करें।

यह पंच महायज्ञ प्रत्येक व्यक्ति के लिए लाभकारी हैं। जो सभी को करने चाहिए।

सत्यपाल वत्स आर्य
अध्यक्ष आध्यात्मिक प्रकोष्ठ
अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा दिल्ली

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