सोनीपत खबर: सोनीपत में नंदिनी गौ माता को वैदिक रीति से सम्मानपूर्ण अंतिम विदाई
सोनीपत: गौ माता को वैदिक विधि से अंतिम विदाई देते हुए
सोनीपत, अजीत कुमार। सोनीपत के हसनयारपुर तिहाड़ा कलां गांव में एक परिवार ने करीब 18 वर्षों तक अपने साथ रही नंदिनी गौ माता को पूरे सम्मान और वैदिक विधि से अंतिम विदाई दी। आषाढ़ मास की सप्तमी पर परिवार के सदस्यों ने पुष्प वर्षा कर श्रद्धांजलि अर्पित की, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अंतिम संस्कार किया और समाधि देते समय 31 किलोग्राम नमक डालकर मिट्टी दी। इस भावुक विदाई को देखने के लिए गांव के अनेक लोग भी पहुंचे।
परिवार के अनुसार नंदिनी जब केवल तीन महीने की बछड़ी थी, तभी उसे महलाना गांव से घर लाया गया था। धीरे-धीरे वह परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गई। करीब दो वर्ष की उम्र में उसकी मां की प्रसव के दौरान मौत हो गई। इसके बाद पूरे परिवार ने उसकी देखभाल बेटी की तरह की। परिवार का कहना है कि उस समय घर में कोई बेटी नहीं थी, इसलिए नंदिनी से उनका भावनात्मक जुड़ाव और गहरा होता चला गया।
परिजनों ने बताया कि नंदिनी ने अपने जीवनकाल में 12 संतानों को जन्म दिया। इनमें से छह गाय आज भी परिवार के पास हैं, जबकि अन्य गौवंश परिचितों और मित्रों के यहां हैं। परिवार आज भी सभी गौवंश की सेवा और देखभाल कर रहा है। करीब एक वर्ष पहले नंदिनी ने समय से पहले एक बछड़ी को जन्म दिया था। कमजोर होने के कारण उसकी एक सप्ताह पहले मौत हो गई। इसके लगभग एक सप्ताह बाद बीमारी के चलते नंदिनी ने भी दम तोड़ दिया। परिवार के अनुसार वह करीब साढ़े तीन महीने से बीमार थी। उसके उपचार के लिए कई चिकित्सकों से सलाह ली गई। चिकित्सकों ने आशंका जताई कि संभव है उसने लोहे का कोई टुकड़ा निगल लिया हो, जिससे उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई। इसके बावजूद उसने अंतिम समय तक भोजन करना नहीं छोड़ा।
परिवार का कहना है कि नंदिनी ने वर्षों तक दूध, घी और छाछ देकर घर के पालन-पोषण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी कारण उसे परिवार के सदस्य जैसा सम्मान दिया गया। अंतिम संस्कार के बाद परिवार ने उसकी स्मृति में हवन और गौ-भोज आयोजित करने का निर्णय लिया है। परिवार ने बताया कि उन्हें गौ सेवा, जीव रक्षा और सनातन संस्कृति के संस्कार पूर्वजों से मिले हैं और वे आगे भी इसी परंपरा को जारी रखेंगे। उनका मानना है कि नंदिनी केवल एक गौ नहीं, बल्कि परिवार की सदस्य थी, इसलिए उसे सम्मान और श्रद्धा के साथ अंतिम विदाई देना उनका नैतिक और धार्मिक दायित्व था।
