कवि दलीचंद जांगिड़ की कलम से: प्रेरणादायक वैदिक भजन
जांगिड़ ब्राह्मणों से करते है हम यह निवेदन….
खुद जाग के समाज को जगा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।
कर्त्तव्य जानो और जगा दो जांगिड़ ब्राह्मणों ।।
अज्ञानता का फिर अंधेरा बढ़ता जा रहा।
तुम ज्ञान का दीपक जला दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
पढ़ना पढ़ाना वेद का सुनना परम धर्म है।
भारत भर में डंका बजा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
अब वक्त है चलने का हमारी महासभा की राह पर।
इस समाज की बिगड़ी बना दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
सब सत्य विद्याओं का पुस्तक वेद है संसार में।
यह बात घर घर में पहुंचा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
तुम सत्य को तो ग्रहण करने में सदा उद्यत रहो।
और झूठ को उलटा घटा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
सब भाईयों की उन्नति में समझो अपनी उन्नति ।
संकीर्णता दिल से मिटा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
समाज का उपकार करना महासभा मुख्य उद्देश्य है।
तुम ज़िन्दगी इस में लगा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
भारत भर में सर्वत्र जांगिड़ ब्राह्मणों सम्मान हो।
इस शान को फिर से दिखा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
यह वक्त की आवाज़ है आपस में लड़ना झगड़ना छोड़ दो।
और प्रेम की गंगा बहा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
पाओं तुम्हारे चूमने को वह ‘गुरू कहे’ मन्ज़िल खड़ी।
मिल के कदम आगे बढ़ा दो जांगिड़ ब्राह्मणों।।
आध्यात्मिक प्रकोष्ठ के सौजन्य से प्रवाहित ज्ञान ज्योति…..
प्रचारक = लेखक कवि दलीचंद जांगिड़ सातारा महाराष्ट्र
