July 15, 2026

पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: रेप की कोशिश पर उठे गंभीर सवाल

Supreme Court takes a stern view of Patna High Court's verdict: Serious questions raised regarding attempted rape.

नई दिल्ली। पटना हाईकोर्ट के एक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर नाराजगी जताते हुए कहा है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों को अधिक संवेदनशीलता और गहन कानूनी अध्ययन के साथ निर्णय देना चाहिए। मामला वर्ष 2008 के एक कथित दुष्कर्म के प्रयास से जुड़ा है, जिसमें हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की विस्तृत समीक्षा करने की बात कही है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने 14 जुलाई को इस मामले का उल्लेख किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि न्यायालय इस फैसले का विस्तार से परीक्षण करेगी और आवश्यक होने पर विस्तृत आदेश जारी करेगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने यौन अपराधों की सुनवाई में संवेदनशील भाषा और दृष्टिकोण अपनाने संबंधी राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) की विशेषज्ञ समिति की गाइडलाइन को भी सभी अदालतों के लिए लागू करने का निर्देश दिया।

यह मामला बांका जिले के एक फोटो स्टूडियो से जुड़ा है। पीड़िता का आरोप था कि 19 जनवरी 2008 को स्टूडियो मालिक ने फोटो खींचने के बहाने उसे कमरे में बंद कर दिया, सलवार उतारने की कोशिश की और उसके साथ जबरन अश्लील हरकत की। युवती के शोर मचाने पर उसके पिता मौके पर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी फरार हो गया।

वर्ष 2013 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास और अवैध बंधक बनाने का दोषी मानते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए कहा कि मामले में दुष्कर्म के प्रयास के पर्याप्त साक्ष्य, मेडिकल प्रमाण और स्पष्ट शारीरिक प्रयास सिद्ध नहीं हुए। अदालत ने माना कि आरोप गंभीर हैं, लेकिन वे भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के दायरे में आते हैं, न कि दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में मेडिकल जांच का अभाव, स्वतंत्र गवाहों की कमी और गवाही में विरोधाभास को भी महत्वपूर्ण आधार माना। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि यौन अपराधों की सुनवाई में केवल तकनीकी पहलुओं के बजाय पीड़िता के अधिकारों और न्यायिक संवेदनशीलता को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

अब इस मामले पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की विस्तृत सुनवाई के बाद होगा। इस फैसले पर देशभर की कानूनी और सामाजिक संस्थाओं की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका प्रभाव यौन अपराधों से जुड़े भविष्य के मामलों की न्यायिक व्याख्या पर भी पड़ सकता है।

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