October 2, 2026

कामयाबी के कदम: नितेश ने एशियाई ग्रीको-रोमन कुश्ती खेलों में रजत जीतकर इतिहास रचा

Sonipat's Nitesh made history by winning a silver medal at the Asian Greco-Roman Wrestling Championships.

सोनीपत: अपने साथियों के साथ नीली सर्ट में नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों के रजत पदक विजेता।

सोनीपत, अजीत कुमार। जापान के यूरी नकाजातो से ग्रीको-रोमन कुश्ती के फाइनल में हार के बावजूद सोनीपत के जागसी गांव के नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीतकर भारतीय कुश्ती में नया इतिहास रचा। नितेश का रजत पदक लंबे अंतराल के बाद ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत के पदक का सूखा खत्म करने वाला रहा। इससे पहले 1962 के एशियाई खेलों में गणपत अंदलकर ने 97 किलोग्राम से अधिक भारवर्ग में भारत के लिए पदक जीता था। इसके बाद भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान इस प्रतियोगिता में पदक नहीं जीत सके थे।

फाइनल में नितेश के पास जापानी पहलवान को हराकर स्वर्ण जीतने का मौका था, लेकिन उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा। इससे पहले भारत के सुमित 60 किलोग्राम और अमन बरोनिया 77 किलोग्राम भारवर्ग में क्वार्टर फाइनल में हारकर बाहर हो गए थे।

नितेश के पिता आनंद ने बताया कि नितेश उनका इकलौता बेटा है। बचपन से ही उनका सपना था कि बेटा पहलवान बने। वह खुद भी पहलवानी करना चाहते थे, लेकिन मौका नहीं मिला। वर्ष 2008 में करीब छह साल की उम्र में नितेश को गांव के अखाड़े में अभ्यास के लिए ले जाना शुरू किया। करीब चार साल तक वह रोज सुबह-शाम उसे अखाड़े में ले जाते और अभ्यास के बाद घर लाते रहे।

वर्ष 2012 में खरखौदा के निजी स्कूल में पढ़ाई के साथ नितेश ने कुश्ती जारी रखी। वर्ष 2014 में प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में अभ्यास के दौरान उसके घुटने में गंभीर चोट लग गई। ऑपरेशन के बाद करीब एक साल तक वह बिस्तर पर रहा। इस दौरान वह मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगा। पिता ने उसे दूध के कारोबार में हाथ बंटाने को कहा। करीब एक साल तक नितेश गांव से दूध खरीदकर पानीपत में दुकान और घर-घर जाकर बेचता रहा। इसके बाद उसने दोबारा कुश्ती खेलने की इच्छा जताई। पिता की अनुमति मिलने पर वर्ष 2017 में खरखौदा की निजी कुश्ती अकादमी में अभ्यास शुरू किया। जिला, हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए उसने कई पदक जीते। एशियाई खेलों के एक ट्रायल में बाहर होने के बाद भी उसने अभ्यास नहीं छोड़ा। परिवार के पास करीब तीन एकड़ जमीन थी और खेती से गुजारा चलता था। कुश्ती का खर्च बढ़ने पर परिवार ने दूध बेचने का काम शुरू किया। आनंद के अनुसार उस समय नितेश की पहलवानी पर करीब 15 हजार रुपये महीने खर्च होते थे। करीब 12 साल पहले परिवार जागसी से पानीपत के सेक्टर-6 में आकर रहने लगा और दूध का कारोबार शुरू किया।

नितेश ने कुश्ती के साथ पढ़ाई भी जारी रखी। वर्ष 2025 में स्नातक के अंतिम वर्ष में उसे कंपार्टमेंट आई। दोबारा परीक्षा देने के बाद 2026 में भी वह इसे पास नहीं कर सका। हालांकि, कुश्ती में उसने लगातार मेहनत जारी रखी। वर्ष 2022 में उसे रेलवे में टिकट निरीक्षक के पद पर नौकरी मिली। नौकरी के साथ अभ्यास करते हुए उसने एशियाई खेलों की तैयारी पर ध्यान केंद्रित किया और फाइनल तक पहुंचा।

आनंद ने बताया कि संयुक्त परिवार में रहने के कारण नितेश को लगातार परिवार का सहयोग मिला। उसके चाचा नवीन के दोनों बेटे भी खरखौदा की कुश्ती अकादमी में अभ्यास करते हैं। परिवार के इसी कुश्ती माहौल और नितेश की मेहनत का नतीजा अब एशियाई खेलों के रजत पदक के रूप में सामने आया है।

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