सोनीपत: गुमड़ की गोल्डन गर्ल किरण पहल का खेतों से एशियन गेम्स तक का सफर
सोनीपत: अपनी साथी खिलाडियों के साथ किरण पहल।
सोनीपत, अजीत कुमार। सोनीपत में गन्नौर क्षेत्र के गांव गूमड़ की बेटी किरण पहल ने अपनी मेहनत और रफ्तार के दम पर एशियाई खेलों में भारत का नाम रोशन किया है। गांव के कच्चे मैदान से शुरू हुआ उनका सफर अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स तक पहुंचा। एशियाई खेल 2026 में किरण ने रिले स्पर्धा में स्वर्ण और मिश्रित टीम स्पर्धा में रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। महिलाओं की 400 मीटर व्यक्तिगत स्पर्धा में वह 53.41 सेकंड के समय के साथ पांचवें स्थान पर रहीं और मामूली अंतर से पदक से चूक गईं। किरण एक अक्टूबर को गांव लौटेंगी, जहां ग्रामीणों की ओर से उनका स्वागत किया जाएगा।
किरण का खेल सफर आसान नहीं रहा। तीसरी कक्षा में उन्होंने कुछ लड़कियों को जिम्नास्टिक करते देखा था। इसके बाद खेलों के प्रति रुचि बढ़ी और पांचवीं कक्षा में स्कूल की साइकिल दौड़, मटका दौड़, रस्सी और दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगीं। शुरुआती प्रतियोगिताओं में उन्हें 500 रुपये तक का पुरस्कार मिला। वर्ष 2010 में वह गांव से करीब दो किलोमीटर दूर बीएसटी स्कूल के मैदान में पैदल जाकर अभ्यास करती थीं। करीब डेढ़ साल तक यह सिलसिला चला। बाद में परिवार ने 300 रुपये में पुरानी साइकिल खरीदकर दी। वर्ष 2014 में उन्होंने सोनीपत के सुभाष स्टेडियम में अभ्यास शुरू किया। बेहतर प्रशिक्षण के लिए 2015 में रोहतक चली गईं। रहने और खानपान का खर्च निकालने के लिए उन्होंने पतंजलि स्टोर में चार हजार रुपये मासिक पर नौकरी की। सुबह अभ्यास, दिन में नौकरी और शाम को फिर मैदान में प्रशिक्षण उनका रोज का कार्यक्रम था।

किरण ने 2018 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में लगातार दो स्वर्ण पदक जीते। दसवीं में कंपार्टमेंट के कारण रेलवे की नौकरी में अड़चन आई तो उन्होंने दोबारा पढ़ाई की और 2019 में दसवीं पास की। इसी साल उन्हें पटियाला के भारतीय खेल शिविर में बुलाया गया। कोविड के कारण 2020 में खेल गतिविधियां प्रभावित हुईं। 25 जून 2021 को उन्होंने रेलवे पटियाला में कनिष्ठ लिपिक के रूप में नौकरी शुरू की। जून 2024 में 50.92 सेकंड का समय निकालकर किरण ने पेरिस ओलंपिक के लिए सीधे क्वालीफाई किया। ओलंपिक में पदक नहीं मिला, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान मजबूत हुई। एशियाई खेलों से पहले 2026 की भारतीय एथलेटिक्स श्रृंखला के सूरत, लुधियाना और संगरूर चरण में उन्होंने स्वर्ण पदक जीते।
किरण की बहन तमन्ना ने बताया कि राष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान किरण के पास करीब 22 हजार रुपये के दौड़ वाले जूते नहीं थे। प्रायोजक नहीं मिलने पर उन्होंने प्रशिक्षक के जूते पहनकर प्रतियोगिता में पदक जीता। तमन्ना के मुताबिक, किरण खेल को लेकर पूरी तरह समर्पित रहती हैं। बड़ी प्रतियोगिता के समय वह बाकी चीजों को पीछे छोड़कर सिर्फ अभ्यास और मुकाबले पर ध्यान देती हैं। उन्हें घर के बने चने के लड्डू पसंद हैं। पेरिस ओलंपिक के दौरान भी वह घर से चने के लड्डू साथ लेकर गई थीं।
मां माया देवी ने बताया कि किरण ने बचपन से ही खेल के लिए काफी मेहनत की है। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य होने के बावजूद उन्होंने बेटी का हौसला नहीं टूटने दिया। किरण जब रोज दूर मैदान में अभ्यास के लिए जाती थीं, तब परिवार उनकी मेहनत देखता था। मां के मुताबिक, एशियाई खेलों में व्यक्तिगत स्पर्धा में पदक से चूकने पर परिवार को निराशा हुई, लेकिन रिले में स्वर्ण पदक मिलने के बाद घर में खुशी का माहौल है। वर्ष 2022 में पिता की बीमारी के दौरान किरण ने अभ्यास छोड़कर उनकी देखभाल की। पिता ने उनसे ओलंपिक पदक जीतने का सपना पूरा करने को कहा था। उनके निधन के बाद यही बात किरण की प्रेरणा बनी। किरण ने वीडियो कॉल पर बताया कि पदक के लिए उन्होंने काफी मेहनत की थी। अब उनका लक्ष्य विश्व चैंपियनशिप और 2028 ओलंपिक है।
