फेल होने वालों की आवाज बना ‘एसके’: अभिलाष थपलियाल बोले-‘एस्पिरेंट्स 3’ में दोस्ती के इमोशन्स ने जीता दिल
‘एसके’ बना संघर्ष की पहचान, दर्शकों से गहरा कनेक्शन।
मुंबई, जीजेडी न्यूज। अभिलाष थपलियाल इन दिनों वेब सीरीज एस्पिरेंट्स के सीजन 3 को लेकर सुर्खियों में हैं। शो में उनका निभाया ‘एसके’ का किरदार दर्शकों के बीच खास पहचान बना चुका है। एक बातचीत में उन्होंने बताया कि इस बार भी सीरीज को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है, खासकर दोस्ती और इमोशन्स से जुड़े सीन लोगों को गहराई से छू रहे हैं। अभिलाष के मुताबिक, ‘एसके’ सिर्फ एक किरदार नहीं बल्कि उन लोगों की कहानी है जो जिंदगी में असफल होते हैं। यही वजह है कि दर्शक उससे खुद को जोड़ पाते हैं।
अपने सफर को याद करते हुए उन्होंने बताया कि एक्टिंग कभी उनका पहला सपना नहीं था। वह आर्मी जॉइन करना चाहते थे और एनडीए क्लियर करना उनका लक्ष्य था, लेकिन हालात ने उन्हें एक अलग राह पर ला खड़ा किया। दिल्ली में रेडियो जॉकी के तौर पर काम करते हुए उनकी मुलाकात फिल्म ‘तेवर’ के डायरेक्टर अमित शर्मा से हुई, जिन्होंने उन्हें एक्टिंग में किस्मत आजमाने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया और फिल्म ‘दिल जंगली’ से अपने करियर की शुरुआत की।
शुरुआती दौर आसान नहीं था। फिल्में ज्यादा नहीं चलीं, तो उन्होंने टीवी, कॉमेडी शोज और सोशल मीडिया पर पॉलिटिकल सटायर के जरिए खुद को सक्रिय रखा। लेकिन असली पहचान उन्हें ‘एस्पिरेंट्स’ से ही मिली। ‘एसके’ का रोल भी उन्हें ऑडिशन के जरिए मिला। दिलचस्प बात यह है कि पहले उन्हें लगा था कि वह ‘अभिलाष’ का किरदार निभाएंगे, लेकिन बाद में ‘एसके’ के रूप में उनकी कास्टिंग हुई।
सीजन 1 की सफलता के बाद जिम्मेदारी जरूर बढ़ी, लेकिन अभिलाष का मानना है कि एक्टर का काम स्क्रिप्ट के साथ ईमानदार रहना है। उनका मंत्र है-“कम में बम”, यानी कम सीन हों लेकिन असरदार हों। रेडियो से एक्टिंग तक के सफर को वह अपने लिए बेहद अहम मानते हैं। उनके अनुसार, रेडियो ने उन्हें आत्मविश्वास दिया, जहां सिर्फ आवाज के दम पर पहचान बनानी होती है।
बिना किसी फॉर्मल ट्रेनिंग के एक्टिंग सीखने वाले अभिलाष मानते हैं कि असली सीख जिंदगी से मिलती है। अलग-अलग जगहों पर रहने से उन्होंने भाषा और एक्सेंट को बेहतर समझा, जो उनके अभिनय में मददगार साबित हुआ। ‘एस्पिरेंट्स’ के बाद उनके करियर में बड़ा बदलाव आया। उन्हें अनुराग कश्यप जैसे फिल्ममेकर्स के साथ काम करने का मौका मिला और उन्होंने ‘ब्लर’, ‘केनेडी’ और फाड़ू जैसे प्रोजेक्ट्स में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
इंडस्ट्री में अपने संघर्ष पर बात करते हुए वह कहते हैं कि आउटसाइडर होने के कारण खुद को साबित करना सबसे बड़ी चुनौती रही है। यहां कोई गॉडफादर नहीं होता, आपको खुद ही आगे बढ़कर मौके बनाने पड़ते हैं। आज भी वह इस प्रक्रिया को जारी मानते हैं। अभिलाष लगातार डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स से मिलते हैं और खुद को बेहतर बनाने के लिए एफटीआईआई और एनएसडी के छात्रों के साथ शॉर्ट फिल्म्स पर काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि एक्टर के तौर पर सीखने और आगे बढ़ने की यह यात्रा कभी खत्म नहीं होती।
