March 25, 2026

13 साल बाद मिली मुक्ति: गाजियाबाद के हरीश राणा का अंतिम संस्कार, 6 लोगों को दे गए नई जिंदगी

Freedom after 13 years Last rites of Ghaziabad's Harish Rana, who gave new life to 6 people

गाजियाबाद के हरीश राणा का अंतिम संस्कार, 6 लोगों को दे गए नई जिंदगी

गाजियाबाद, जीजेडी न्यूज। 13 साल तक कोमा में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने वाले गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा का बुधवार को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में अंतिम संस्कार कर दिया गया। सुबह 9:40 बजे छोटे भाई आशीष ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान माहौल बेहद भावुक रहा। पिता अशोक राणा ने बेटे को अंतिम प्रणाम करते हुए हाथ जोड़कर उपस्थित लोगों से अपील की कि कोई रोए नहीं, ताकि उनका बेटा शांति से विदा हो सके। उन्होंने कहा कि वे प्रार्थना करते हैं कि हरीश को अगला जन्म भगवान के आशीर्वाद के साथ मिले। 24 मार्च को दिल्ली एम्स में हरीश ने अंतिम सांस ली थी। इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद यह देश का पहला ऐसा मामला बना, जिसने संवेदनशील बहस को जन्म दिया और मानवता की नई मिसाल भी पेश की।

श्मशान घाट में भावुक विदाई
हरीश राणा का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया, जहां परिजनों और परिचितों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार किया गया। पिता अशोक राणा का दर्द साफ झलक रहा था, लेकिन उन्होंने साहस दिखाते हुए बेटे की शांतिपूर्ण विदाई की कामना की।

इच्छामृत्यु के बाद ली अंतिम सांस
हरीश राणा ने 24 मार्च को दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। उन्हें पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) दिया गया था, जिसमें मरीज को जिंदा रखने वाले लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटा दिया जाता है, ताकि मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इसकी अनुमति दी थी, जो देश का पहला ऐसा मामला बना।

अंगदान से 6 लोगों को जीवनदान
हरीश के परिवार ने उनके निधन के बाद बड़ा निर्णय लेते हुए उनके फेफड़े, दोनों किडनी और कॉर्निया दान कर दिए। इससे 6 जरूरतमंद लोगों को नया जीवन मिलने की उम्मीद है। इस कदम की हर ओर सराहना हो रही है।

13 साल पहले हादसे ने बदल दी जिंदगी
हरीश राणा दिल्ली में जन्मे थे और चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया और वे कोमा में चले गए। तब से वे न बोल सकते थे और न ही किसी चीज को महसूस कर पाते थे।

लंबी बीमारी और परिवार की पीड़ा
डॉक्टरों ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित बताया था, जिसमें मरीज पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। 13 साल तक वेंटिलेटर, दवाइयों और देखभाल के चलते परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुका था। शरीर पर पड़े बेडसोर ने उनकी स्थिति और भी गंभीर बना दी थी।

न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई
हरीश के परिवार ने 3 अप्रैल 2024 को दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां से अंततः उन्हें 11 मार्च को अनुमति मिल गई।

आध्यात्मिक और सामाजिक समर्थन
ब्रह्मकुमारी रूपा ने बताया कि यह समय परिवार के लिए बेहद कठिन था। उन्होंने हरीश को आत्मिक शांति के लिए प्रेरित किया। वहीं यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने परिवार की 13 साल की सेवा को मिसाल बताते हुए समर्थन जताया।

एक मिसाल बन गया यह परिवार
हरीश राणा की कहानी केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि एक परिवार के संघर्ष, त्याग और साहस की कहानी है। इच्छामृत्यु और अंगदान के इस मामले ने समाज को संवेदनशीलता और मानवता का नया दृष्टिकोण दिया है।

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