February 28, 2026

कवि दलीचंद जांगिड़ की कलम से: अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा दिल्ली के अन्तर्गत बना-“राष्ट्रीय आध्यात्मिक प्रकोष्ठ”

From the pen of poet Dalichand Jangid: "National Spiritual Cell" formed under All India Jangid Brahmin Mahasabha, Delhi

पंडित सत्यपाल जी वत्स।

🕉️ ध्यान और मन 🕉️

“” “” “वर्तमान मे निरन्तर समाज में बदल रही सामाजिक परिस्तिथियों में हर कोई चिंता से पिड़ीत है तब आध्यात्म हि एक मन शांति के लिए योग्य विकल्प है, इस पर यह आलेख पढ़कर आचरण में लाना जरुरी हो जाता है।

ध्यान से मन ठीक तो तन ठीक
कर ध्यान ईश्वर का तू….
ईश्वर तुम्हारा है, तुम ईश्वर के हो,
तुम संसार में आये हो,
परन्तु संसार तुम्हारा हो ना सका,
भौतिकता सब तरफ छाई है,
मोह – माया चारों ओर मडराई है,
ईश्वर के चरणों में ध्यान लगाया कर,
चाहना तो सब समय पाकर,
वियोग की ओर जा रही है,
ध्यान से तन ठीक तो मन ठीक,
कह रहे कवि दलीचंद जांगिड़,
ईश्वर के तू गुण गाया कर….

पंडित सत्यपाल जी वत्स अपने प्रवचन में कहते है कि – – आधुनिक परिवेश में इंसान भौतिकता के परिवेश में इतना खो गया है कि उसका दिन का चैन और रातों की नींद गायब हो गई है। लोगों के जीवन में सुख के साधन तो बहुत हैं पर मन में शांति नहीं है। आज व्यक्ति तन से कम और मन से ज्यादा बीमार है। लोगों के जीवन में आधी से अधिक बीमारियां मन की होती है। इसलिए कहा जाता है मन ठीक तो तन ठीक। मन को ठीक रखने के लिए ध्यान मनुष्य के लिए सबसे उत्तम माध्यम है। मन का संतुलन बना है तो व्यक्ति के जीवन में सन्तुलन कायम है। मन शक्तिशाली है तो दुनिया की हर चीज अच्छी लगेगी, नहीं तो सुख के साधन भी खुशियां नहीं देते। मन संतुष्ट न हो तो अमीरी में रहते हुए भी भिखमंगों जैसा हाल बना रहता है। मन में किसी के प्रति कोई बात बैठ जाए तो सामने वाला ठीक भी हो तो उसके प्रति मन में आशंका आएगी। मन अशांत, भयभीत रहने लग जाए तो मानसिक बीमारियां शुरू हो जाती हैं। मनुष्य का स्वभाव, सरल, सहज, पवित्र, निर्मल, ईमानदार, शालीन एवं प्रसन्न रहना है। प्रकृति ने उसे शांतिवाला, प्रेमपूर्ण और निर्मल बनाया है, किंतु क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, मोह और लालच आदि बुरी वृतियों से उसका स्वभाव प्रभावित होता है और वह अशांत हो जाता है। इस दौड़ती भागती जिंदगी में आज हर व्यक्ति अकारण हताशा-निराशा और तनावग्रस्त है। यदि आप चाहते हैं कि जीवन में आशा-उत्साह का संचार हो और तनाव से मुक्ति मिले, तो ध्यान अवश्य करे। ध्यान आंतरिक शक्तियों, क्षमताओं और मानसिक ऊर्जा को जागृत करने का साधन है। जिससे व्यक्ति पारिवारिक, सामाजिक व आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति करता है। भीतरी बात गहरी बात- मन को स्वस्थ रखने के लिए उसे रोग, भोग और शोक से बचाकर रखे।
जय श्री ब्रह्म ऋषि अंगिरा जी महाराज की

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