कवि दलीचंद जांगिड़ की कलम से: मानव जीवन चलता है, नदियां की धारा समान….
कवि दलीचंद जांगिड़।
नदियां कल कल बहती रहती
पहाड़ों से उछल-कूद कर
पत्थरों से टकराती बल खाती
नाग-मोड़ तीव्र चाल ये चलती
अपना मैदानी रुख तय करती
अपने पथ की हर मुश्किलें सहती
नदि गांव कस्बें शहर से गुजरती
निस्वार्थ सेवा में अग्रसर रहती
राह अपनी आएं कुँआ बावड़ी
और तालाब सबको यह भरती
प्यासी जनता की प्यास बुझाती
खेत खलियानों में सिंचाई करती
समतल मैदानों में शांत हो जाती
बिलकुल शांत ठहरी सी लगती
समुंदर को देख फूली ना समाती
देख समुंदर को ढलान में ढलती
मातृत्व की जागृति होने पर….
हंसते हंसते समुंदर में मिल जाती
“मानव जीवन”
मानव जीवन है बहतीं नदियां की धारा समान
यह जीवन उतार चढ़ाव सहता रहता
कभी बसंत में पाता कस्तूरी सी गंध
कभी पतझड़ में पाता जैविक सी गंध
रुखे-सुखे मौसम में पाता मिट्टी की गंध
फूलों और कांटों से भरा यह जीवन
कभी दु:खों से जीवन गुजरता रहता
कभी खुखों में जीवन चिमटकर रहता
उम्र के चलते वेदनाओं में ढलता रहता
बिल्कुल शांत ठहरा ठहरा सा लगता
यह जीवन तो दिखता, बनता, लगता
ता-उम्र बहती हुई नदियां धारा समान
प्रभू स्मर्ण करते ये जीवन चलता रहता
यूं ही चलता रहता ता-उम्र मानव जीवन
नदियां की उस धारा समान…..
जय श्री ब्रह्म ऋषि अंगिरा जी
