कवि दलीचंद जांगिड़ की कलम से: ठहरा हुआ मन
पंडित सत्यपाल जी वत्स।
पं. सत्यपाल जी वत्स की प्रवचन श्रृंखला से….
बीज भी जब माटी के अंदर गहरे में जाकर शांत हो जाता है, तब वह पौधा बनता है। दूध में जामुन लगाकर जब बिना हलचल की अवस्था में रखा जाता है, तो दही जम जाती है। लेकिन मन भाग-भाग कर उलझनों को सुलझा लेना चाहता है। उलझन मन की भगदड़ से उत्पन्न होने वाला विकार है और सुलझन मन के ठहराव से पैदा होती है। भागता हुआ मन, समस्याओं में ले जाता है और ठहरा हुआ मन हमें समाधान की तरफ ले जाता है। जीवन में जो महत्वपूर्ण समस्याएं होती हैं, धीरे-धीरे सोच कर ही हम उन सबका समाधान कर सकते हैं। स्लो-थिंकिंग और उसी के हिसाब से प्लानिंग करके हम हर बड़ी समस्या का समाधान कर सकते हैं। मगर हम जल्दबाजी करते हैं, उतावलापन करते हैं, इसलिए समस्याएं जल्दी नहीं सुलझतीं। हमारी कोशिश मन के ठहरे पन की हो, इसलिए अध्यात्म में ध्यान, एकांत, मौन, स्वाध्याय, सत-शास्त्रों का अध्ययन, सत्संग की बात कही गई है कि मन ठहर जाए। ठहरा मन विवेक को पैदा करेगा और विवेक ही जीवन को सही राह दिखाएगा।
पंडित सत्यपाल जी वत्स
मराठी भाषा में……
मना ला स्तिथर ठेवणे सोपे नाही….
मराठी भाषा में भी यह मुहावरा प्रसिद्ध है,
“मनाचा ब्रेक ह्याच उत्तम ब्रेक मानला जातो”
“” “” “” “मनावर नियंत्रण ठेवणे एवढे सोपे नाहीं कारण मनाची गति भयंकर वेगवान अस्ते, चल बिचल स्वभाव (माकड़ उड़ी) त्यात अणकीन भर टाकत अस्ते मणून तज्ञांचे महण्य आहे कि विवेक पूर्ण विचार करूनच कुठलाच कामाला हाथ घातले पाहिजे नाहीतर….
” अति घाई संकटाला नेईल “
शांत मन ठेवून बुद्धी आणि विवेकपूर्ण विचार केल्यास कुठले ही कार्यात यश प्राप्ती अवश्य मिळते… नाहीतर अतिघाई करून मनोविकार चा शिकारहोऊन वेडेपणा ला बळी पडतोय…..
जय हरि विठ्ठल, जय हरि पांडुरंगा
जय श्री ब्रह्म ऋषि अंगिरा जी
