सफलता का मुकाम यूं ही नहीं मिलता: 64 वर्षों के अनुभव की कहानी
- भारतीय प्रेस परिषद की सदस्यता तक का सफर: संस्कार, संघर्ष, साधना और सतत सीखने की प्रेरक दास्तान
नरेंद्र शर्मा परवाना
जिंदगी में हर इंसान सफल होना चाहता है। वह ऊंचा मुकाम हासिल करना चाहता है। जब वह किसी सफल व्यक्ति को सम्मान पाते, लोगों से प्रशंसा बटोरते और समाज में प्रतिष्ठा हासिल करते देखता है, तो उसके मन में भी वैसा ही बनने की इच्छा जागती है। वह भी चाहता है कि लोग उसकी सराहना करें, उसे पहचानें और उसके काम का सम्मान करें। लेकिन अक्सर वह सफलता की चमक तो देखता है, उसके पीछे छिपे संघर्ष, त्याग, अनुशासन और वर्षों की मेहनत को नहीं समझ पाता।
हाल ही में भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के सदस्यों के साथ राज परवाना नरेंद्र सिंह के चयन की अधिसूचना 7 अक्टूबर 2026 को जारी हुई। इस उपलब्धि ने मुझे अपने जीवन के बीते वर्षों को फिर से देखने का अवसर दिया। ज्ञान ज्योति दर्पण डिजिटल पोर्टल के साथ जुड़े अपने साथियों और पाठकों से मैं अपने जीवन के अनुभव सांझा करना चाहता हूं। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि जिंदगी की पाठशाला में सीखी गई बातों का निचोड़ है।
मेरी कोशिश है कि इन अनुभवों से किसी एक व्यक्ति को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिले, तो यह लेखन सार्थक हो जाएगा। आखिर जिंदगी का असली आनंद केवल अपनी मंजिल तक पहुंचने में नहीं, बल्कि उस रास्ते से सीखने और दूसरों के काम आने में है।
16 जून 1962: पुगथला गांव से शुरू हुआ जीवन का सफर
मेरे जीवन की महत्वपूर्ण तारीख 16 जून 1962 है। हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव पुगथला में मेरा जन्म हुआ। मां सावित्री देवी ने मुझे ममता का आंचल दिया और पिता रामेश्वर शर्मा ने संस्कारों से जीवन को दिशा दी। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस होता है कि इंसान की असली पूंजी उसके संस्कार होते हैं। यही संस्कार कठिन समय में उसका सहारा बनते हैं और सही-गलत का अंतर समझाते हैं।
वर्ष 1973 में पहली बार गांव से बाहर जाने का अवसर मिला। पिता जी हमें झांसी लेकर गए। वे सेना में हेड क्लर्क थे। वहां केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई की। झांसी के खुशीपुरा और बंशी नगर में रहने के बाद एडवर्ड लाइन के 15/15 नंबर क्वार्टर में भी रहे। उस समय जीवन की जरूरतें सीमित थीं, लेकिन अनुभवों की दुनिया धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी।
दो शिक्षक, जिन्होंने जीवनभर के लिए मन में जगह बनाई
झांसी के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई के दौरान दो शिक्षक मेरे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। कृष्णा भाटिया मैडम संस्कृत पढ़ाती थीं। मुझे अंग्रेजी नहीं आती थी, इसलिए वह मुझे सदर बाजार स्थित अपने घर बुलाकर अंग्रेजी पढ़ाती थीं। दूसरे शिक्षक रसायन विज्ञान के अध्यापक आरए खान थे। आज मैं अपने जीवन के 64 वर्ष से अधिक के अनुभवों को देखता हूं, तो इन दोनों शिक्षकों को विशेष रूप से याद करता हूं। एक पंजाबी थीं और दूसरे मुस्लिम, लेकिन मेरे लिए उनकी पहचान किसी धर्म या समुदाय से नहीं, बल्कि उनके स्नेह और समर्पण से है। उन्होंने अपने व्यवहार से सिखाया कि शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देता, बल्कि विद्यार्थी के जीवन को भी संवारता है।
आज वे कहां हैं, मुझे नहीं मालूम, लेकिन मेरी जीवन-किताब उनके नाम के बिना अधूरी है। मैं उन्हें आदर्श शिक्षक मानता हूं। उनके प्रति मन में आज भी वैसा ही सम्मान है, जैसा बचपन में था। यह अनुभव मुझे बार-बार सोचने पर मजबूर करता है कि हम भी अपने जीवन में ऐसा क्या करें, जिससे हमारे जाने के बाद भी लोग हमें अच्छे कामों के लिए याद रखें।
पिता का सम्मान देखकर समझ आया कि असली कमाई क्या है
पिता जी की सेना में तैनाती के कारण वर्ष 1975 में झांसी से अंबाला छावनी स्थानांतरण हो गया। वहां जाने के लिए जब हम रेलवे स्टेशन पहुंचे, तो एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसे आज भी भूल नहीं पाया हूं।
पिता जी को विदा करने के लिए सौ से अधिक महिला-पुरुष रेलवे स्टेशन पर आए थे। कई लोगों की आंखों में आंसू थे। लोग बार-बार उनके चरण स्पर्श कर रहे थे। वहां मौजूद यात्री भी यह दृश्य देखकर पूछने लगे कि क्या ये कोई बड़े नेता हैं? उन्हें बताया गया कि ये नेता नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें लोग अपने व्यवहार और सेवाभाव के कारण इतना सम्मान देते हैं।
पिता जी को लोगों से मिलता यह सम्मान मेरे बालमन पर गहरी छाप छोड़ गया। उस दिन मैंने मन ही मन महसूस किया कि कमाई केवल पैसे की नहीं होती। इंसान ऐसी पूंजी भी कमा सकता है, जो लोगों के दिलों में जगह बनाती है।
मेरे लिए यह जीवन का पहला बड़ा सबक था। पद और पैसा समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन अच्छे व्यवहार से अर्जित सम्मान लंबे समय तक बना रहता है।
संघर्ष के बीच पढ़ाई और सेना में भर्ती होने का सफर
15 अगस्त 1977 को पिता जी का स्थानांतरण अंबाला छावनी हो गया। वहां हम चिलिया वाली लाइन में रहे। पढ़ाई के दौरान मैंने शांति निकेतन महाविद्यालय के माध्यम से निजी परीक्षार्थी के रूप में दसवीं का फार्म भरा। मेरे साथ कुल 29 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी थी, लेकिन परिणाम में केवल मैं पास हुआ। वर्ष 1979 में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करना मेरे लिए बड़ी उपलब्धि थी।
इसके बाद 7 जून 1980 को सेना में भर्ती हो गया। पहली तैनाती ग्वालियर में मिली। बाद में कारगिल, कारू और लेह जैसे क्षेत्रों में सेवा करने का अवसर मिला। 15 अगस्त 1982 को असम के मिसामारी पहुंचा। वहां से रंगापाड़ा और तेजपुर जाने का अवसर मिलता था। तेजपुर उस समय भारतीय रेलमार्ग का अंतिम छोर था।
तवांग क्षेत्र में भी तैनाती रही। सीमावर्ती क्षेत्र में सेवा के दौरान चीन की सीमा देखने का अवसर मिला। एक बार जंगल में रास्ता भटक गया था। काफी दूर तक भटकने के बाद अपनी जगह तक पहुंच पाया। यहां हमें मैप रीडिंग काम आई। ऐसी घटनाएं उस समय भले ही कठिन लगती हों, लेकिन बाद में वही अनुभव इंसान को धैर्य और विपरीत परिस्थितियों में रास्ता खोजने की सीख देते हैं।
सेना की नौकरी ने अनुशासन, जिम्मेदारी और कठिन परिस्थितियों में डटे रहने का महत्व समझाया। जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए केवल प्रतिभा पर्याप्त नहीं होती, नियमित मेहनत और कर्तव्य के प्रति ईमानदारी भी जरूरी है।
सेना की नौकरी के साथ अध्यात्म से जुड़ाव
असम में रहते हुए मेरे जीवन का एक दूसरा पक्ष भी विकसित हुआ। मिसामारी से तेजपुर की दूरी करीब 36 किलोमीटर थी। मैं सत्संग में शामिल होने के लिए वहां जाता था। उस समय कृष्ण लाल सिंह स्टील इंडस्ट्री में प्रबंधक के रूप में कार्यरत थे। वहीं लालबहादुर, जो भारत-तिब्बत सीमा पुलिस में अपर डिवीजन क्लर्क थे, खैराती लाल और सरोज, मूर्ति बिहारी लाल जैसे लोगों के साथ संपर्क बना।
तेजपुर जाने के लिए सुबह पौने आठ बजे बस मिलती थी और दोपहर बाद साढ़े तीन बजे मिसामारी लौटने का साधन था। कई बार साइकिल से भी सफर करता था। यह सब आसान नहीं था, लेकिन सत्संग से मिलने वाली आत्मिक शांति मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी।
इस अनुभव ने समझाया कि जीवन में बाहरी सफलता के साथ मन की शांति भी जरूरी है। कामकाज की भागदौड़ के बीच इंसान को अपने भीतर झांकने और स्वयं को समझने के लिए भी समय निकालना चाहिए।
परिवार बना जीवन का आधार
7 मई 1987 को गांव चिड़ी, जिला रोहतक में राजरानी के साथ मेरा विवाह हुआ। परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं और जिंदगी एक नए पड़ाव में प्रवेश कर गई।
परिवार जीवन की वह ताकत है, जो इंसान को कठिन समय में संभालती है। जीवन में कामयाबी हासिल करने के लिए बाहर की दुनिया में मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन घर से मिलने वाला सहयोग और अपनापन उस मेहनत को आगे बढ़ाने की ऊर्जा देता है।
सेना से पत्रकारिता तक: जिंदगी ने बदली दिशा
सेना में करीब 17 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद 30 अप्रैल 1997 को पेंशन लेकर सेवा से अलग हुआ। सेना से विदाई के साथ जीवन का एक अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन सीखने और काम करने की इच्छा बनी रही।
फरवरी 1998 में डॉ. पवन सहयोगी के सहयोग से डॉ. जगन्नाथ शर्मा हंस के माध्यम से दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र ज्ञान ज्योति दर्पण में संपादक की जिम्मेदारी मिली। इस समाचार पत्र में पत्नी राजरानी ने स्वामित्व की जिम्मेदारी संभाली। 17 अप्रैल 2000 को दैनिक भास्कर से जुड़ने का अवसर मिला। यहां लंबे समय तक काम करने के बाद 31 जनवरी 2018 को स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया। इसके पीछे अपनी कुछ पुस्तकों के लेखन की इच्छा थी। करीब एक वर्ष के अंतराल के बाद 13 जनवरी 2019 को हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी में काम शुरू किया।
इन अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए समझ आया कि हर जगह का अनुभव कुछ नया सिखाता है। पत्रकारिता केवल खबर लिखने का काम नहीं, बल्कि समाज को समझने, लोगों की आवाज सामने लाने और तथ्यों के प्रति जवाबदेह रहने की जिम्मेदारी भी है।
1980 में शुरू हुआ लेखन, जिसने बनाई अलग पहचान
मेरा लेखन सफर वर्ष 1980 में शुरू हुआ। जनवरी 1980 में मेरी पहली रचना आगरा से प्रकाशित युवक मासिक पत्रिका में छपी। इसके संपादक प्रेमदत्त पालीवाल थे। आज उनके पुत्र देवेंद्र दत्त पालीवाल संपादन का कार्य कर रहे हैं।
धीरे-धीरे लेखन का दायरा बढ़ा। देश के दस राज्यों से प्रकाशित लगभग 400 दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित हुईं। इनमें गीत, कविता, गजल, भजन, लेख, आलेख, परिचर्चा, समाचार और लघुकथाएं शामिल हैं।
पत्रकारिता और साहित्य ने मुझे समाज के अलग-अलग रूपों को समझने का अवसर दिया। हर व्यक्ति की अपनी कहानी होती है। किसी के जीवन में संघर्ष होता है, किसी में सेवा का भाव, तो किसी में ऐसा अनुभव, जिससे दूसरे लोग सीख सकते हैं। लेखन का आनंद इसी में है कि अपने शब्दों के माध्यम से उन अनुभवों को लोगों तक पहुंचाया जाए।
साहित्यिक सम्मान बने आगे बढ़ने की प्रेरणा
लेखन और साहित्य साधना के दौरान विभिन्न संस्थाओं से सम्मान प्राप्त हुए। 22 अक्टूबर 1984 को मध्य प्रदेश के नवोदित साहित्यकार संघ, गढ़ा, जबलपुर की ओर से अभिनंदित कवि सम्मान मिला। 21 फरवरी 1989 को इसी संस्था ने श्रेष्ठ गीतकार सम्मान प्रदान किया।
15 जून 1993 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में साहित्यिक संस्था साहित्यलोक की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। इसके साथ साहित्य श्री अलंकरण से सम्मानित किया गया।
अमेरिका की ओर से भी आध्यात्मिक विकास के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मान प्रदान किया गया। Awards from America – Five Thousand Personalities of the World for Outstanding Contributions to Spiritual Development के रूप में किया गया है।
इन सम्मानों को याद करने का उद्देश्य अपनी उपलब्धियां गिनाना नहीं, बल्कि यह बताना है कि समय-समय पर मिलने वाला प्रोत्साहन इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देता है। सम्मान तभी सार्थक होता है, जब वह व्यक्ति को अपने काम के प्रति और अधिक जिम्मेदार बनाए।
डिजिटल दौर के साथ खुद को भी बदला
समय बदलता है, तकनीक बदलती है और लोगों तक जानकारी पहुंचाने के तरीके भी बदलते हैं। मैंने भी समय के साथ अपने काम को नया रूप देने का प्रयास किया। प्रिंट पत्रकारिता के साथ डिजिटल माध्यम में प्रवेश किया।
ज्ञान ज्योति दर्पण की वेबसाइट [www.gyanjyotidarpan.com](http://www.gyanjyotidarpan.com) के अलावा जीजेडी न्यूज और जीजेडी धर्म नाम से यूट्यूब चैनल शुरू किए। इस बदलाव ने सिखाया कि अनुभव कितना भी पुराना क्यों न हो, नई चीजें सीखने की जरूरत कभी खत्म नहीं होती।
मेरा मानना है कि जीवन का हर दिन नया होता है। इंसान को हर सुबह नई ऊर्जा के साथ शुरुआत करनी चाहिए। यदि वह यह सोचकर रुक जाए कि अब सब कुछ सीख लिया, तो उसकी प्रगति भी रुक जाती है।
पुस्तकों के माध्यम से जीवन के अनुभवों को सहेजने का प्रयास
वर्तमान में मैं धर्म और अध्यात्म से जुड़ी पुस्तकों के लेखन में विशेष रूप से जुटा हूं। इनमें तीन महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं।
पहली पुस्तक दिव्य धारा शिव साधना पर आधारित है, जिस पर करीब 26 वर्षों से काव्य ग्रंथ लेखन और चिंतन का कार्य चलता रहा है। दूसरी पुस्तक सतकुंभा महिमा पर केंद्रित है, जो लगभग दस वर्षों के शोध और अध्ययन पर आधारित काव्य रचना है। तीसरी पुस्तक आ तेरी उम्मीदों का आसमान दे दूं जैन मुनि उपाध्याय डॉ. गुप्ति सागर जी महाराज के साथ 25 वर्षों तक हुई वार्ताओं पर आधारित है। इसमें जीवन के विभिन्न पहलुओं पर हुई चर्चा को समेटने का प्रयास किया गया है।
इन पुस्तकों के माध्यम से मेरा उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने वाले विचारों और अनुभवों को पाठकों तक पहुंचाना है। सही विचार इंसान की सोच बदल सकते हैं और बदली हुई सोच उसके व्यवहार तथा जीवन की दिशा को प्रभावित कर सकती है।
भारतीय प्रेस परिषद की सदस्यता: उपलब्धि के साथ बढ़ी जिम्मेदारी
सात अक्टूबर को भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य के रूप में मेरे चयन से संबंधित राजपत्र अधिसूचना जारी हुई। मेरे लिए यह जीवन के लंबे सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन इस उपलब्धि को केवल किसी पद तक पहुंचने की कहानी मानना सही नहीं होगा। इसके पीछे वर्षों का लेखन, पत्रकारिता, अध्ययन, अनुशासन और अनेक लोगों का सहयोग रहा है।
सेना में 17 वर्षों की सेवा के बाद 30 अप्रैल 1997 को मुझे अनुकरणीय चरित्र प्रमाण पत्र मिला था। आज भी मैं मानता हूं कि किसी पद या सम्मान से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपने चरित्र, आचरण और जिम्मेदारियों के प्रति कितना ईमानदार है।
भारतीय प्रेस परिषद की सदस्यता के साथ पत्रकारिता के प्रति जिम्मेदारी का एहसास और गहरा हुआ है। इस अवसर पर आईएपीएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पवन सहयोगी का फोन आया। उन्होंने बधाई देते हुए कहा कि ध्यान रखना, तुम्हारे हर शब्द पर लोगों की नजर रहेगी। इसलिए सावधानी से अपनी जिम्मेदारी निभानी है और संबंधित विषयों का अध्ययन करते रहना है।
उनकी यह बात मेरे लिए बधाई से बढ़कर एक सीख है। पद मिलने के बाद व्यक्ति की जिम्मेदारी कम नहीं होती, बल्कि बढ़ जाती है। सार्वजनिक जीवन में बोले गए शब्द और किए गए काम दोनों का महत्व होता है। इसलिए हर बात सोच-समझकर कहना और हर विषय को समझने के बाद अपनी राय बनाना जरूरी है।
सफलता का असली सूत्र: जिन्होंने हाथ पकड़कर चलना सिखाया, उन्हें याद रखें
आज अपने जीवन के 64 वर्षों से अधिक के सफर को देखता हूं, तो लगता है कि समय कितनी तेजी से गुजर गया। बचपन में जिन रास्तों पर चला, जिन शिक्षकों से सीखा, जिन लोगों ने सहयोग किया और जिन संस्थानों में काम करने का अवसर मिला, उन सबने जीवन को कुछ न कुछ दिया।
मैंने जिंदगी को आनंद के साथ जीने और हर पल कुछ नया सीखने की कोशिश की है। आज भी मन में यही भाव रहता है कि मैं एक छोटा-सा विद्यार्थी हूं, जिसे अभी बहुत कुछ सीखना है।
मेरे जीवन का लक्ष्य है-वैचारिक क्रांति, चरित्र निर्माण और सकारात्मकता का महाअभियान। सकारात्मक लेखन से मुझे आनंद मिलता है। मैं चाहता हूं कि शब्द लोगों के मन में अच्छे विचार जगाएं, उनके जीवन में उम्मीद पैदा करें और समाज को बेहतर बनाने में योगदान दें। मेरे अनुभवों का निष्कर्ष यही है कि कामयाब होना बड़ी बात है, लेकिन कामयाबी मिलने के बाद भी अपने मूल्यों पर कायम रहना उससे भी बड़ी बात है। सफलता के शिखर पर पहुंचकर उन लोगों को कभी नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने हमारा हाथ पकड़कर चलना सिखाया। माता-पिता, गुरुजन, परिवार, मित्र और सहयोगी-इन सबके प्रति आभार का भाव बनाए रखना चाहिए।
भारतीय प्रेस परिषद की सदस्यता मेरे लिए मंजिल नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का एक नया पड़ाव है। अभी बहुत कुछ सीखना है, बहुत कुछ लिखना है और समाज के लिए उपयोगी काम करना है।
जिंदगी का यही सूत्र मैंने अपने अनुभवों से सीखा है-सफलता पाने के लिए मेहनत करते रहिए, सफलता मिलने पर विनम्र बने रहिए और आगे बढ़ने के बाद भी सीखना कभी मत छोड़िए।
