दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज ओटीटी से हटाई गई: जसवंत सिंह खालड़ा पर बनी फिल्म को लेकर फिर छिड़ी बहस
दिलजीत की फिल्म OTT प्लेटफॉर्म से हटाई गई। इस पर उन्होंने कहा-एक इंसानियत होती है, वह इंसानियत मर गई।
नई दिल्ली। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही ओटीटी मंच से हटा दिया गया है। यह फिल्म पहले ‘पंजाब 95’ नाम से जानी जाती थी और करीब तीन वर्षों तक विभिन्न कारणों से रिलीज नहीं हो सकी थी। नाम बदलने के बाद इसे ओटीटी पर प्रदर्शित किया गया, लेकिन अब इसे अगले आदेश तक हटा दिया गया है।
फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें फिल्म हटने का उतना दुख नहीं है, क्योंकि यह पहले ही दर्शकों तक पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर एक बार कोई सामग्री आ जाए तो उसे पूरी तरह हटाना आसान नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि इस फिल्म के साथ वही हुआ, जो कभी जसवंत सिंह खालड़ा के साथ हुआ था।
फिल्म प्रदर्शित करने वाले ओटीटी मंच ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए फिल्म को अस्थायी रूप से हटाया गया है। कंपनी ने स्पष्ट किया कि वह कानूनी प्रक्रिया के तहत सभी आवश्यक विकल्पों पर काम कर रही है और जल्द ही फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि फिल्म हटाने के पीछे किसी विशेष कारण का आधिकारिक खुलासा नहीं किया गया है।
सूत्रों के अनुसार आशंका जताई गई है कि फिल्म के कुछ दृश्य और घटनाओं का दुरुपयोग भारत विरोधी तत्व कर सकते हैं। यह भी माना जा रहा है कि पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कुछ संगठन फिल्म की सामग्री का उपयोग अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए कर सकते हैं। हालांकि इस संबंध में सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा
जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। उन्होंने उग्रवाद के दौर में कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता लोगों के मामलों की स्वतंत्र जांच की थी। उन्होंने श्मशान घाटों और सरकारी अभिलेखों का अध्ययन कर दावा किया था कि पंजाब में लगभग 25 हजार लोगों की अवैध हत्या के बाद उनका गुप्त अंतिम संस्कार किया गया।
बाद में यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने अपनी जांच में तरनतारन जिले में 2,097 अवैध अंतिम संस्कार होने की पुष्टि की थी। वर्ष 1995 में जसवंत सिंह खालड़ा का अपहरण हो गया था। बाद में जांच में कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई और सर्वोच्च न्यायालय ने भी दोषी अधिकारियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
फिल्म को लेकर पहले भी रहा विवाद
इस फिल्म की घोषणा वर्ष 2022 में की गई थी। शुरुआत में इसका नाम ‘घल्लूघारा’ रखा गया था, जिसे बाद में बदलकर ‘पंजाब 95’ कर दिया गया। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने फिल्म में कई संशोधन और कट लगाने का सुझाव दिया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार फिल्म में 127 बदलाव सुझाए गए थे। भारत में सिनेमाघरों में रिलीज की अनुमति नहीं मिलने के बाद इसे ओटीटी मंच पर ‘सतलुज’ नाम से प्रदर्शित किया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं
फिल्म हटाए जाने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी प्रतिक्रिया दी। कुछ नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा विषय बताया, जबकि अन्य ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस बीच फिल्म को दोबारा ओटीटी पर उपलब्ध कराने की मांग भी उठने लगी है।
फिलहाल फिल्म को लेकर विवाद जारी है और दर्शकों की नजर इस बात पर टिकी है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे दोबारा प्रदर्शित किया जाएगा या नहीं।
