March 11, 2026

फॉरेन इन्वेस्टमेंट: पड़ोसी देशों के निवेश नियमों में ढील, 10% से कम हिस्सेदारी पर ऑटोमैटिक मंजूरी

Relaxation of investment norms from neighbouring countries, automatic approval for stakes less than 10%

नई दिल्ली, अजीत कुमार। केंद्र सरकार ने चीन सहित भारत के साथ ज़मीनी सीमा साझा करने वाले पड़ोसी देशों से आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के नियमों में अहम ढील देने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार (10 मार्च) को हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में प्रेस नोट-3 के तहत लागू FDI नीति में बदलाव को मंजूरी दी गई। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य विदेशी निवेश को बढ़ावा देना और देश में कारोबार करना आसान बनाना है।

नए नियमों के अनुसार अब उन निवेश प्रस्तावों को ऑटोमैटिक मंजूरी मिल सकेगी, जिनमें पड़ोसी देश के निवेशक की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम हो और कंपनी के संचालन या फैसलों पर उसका कोई नियंत्रण न हो। इससे पहले ऐसे मामलों में भी सरकारी मंजूरी जरूरी होती थी, जिससे कई निवेश प्रस्ताव अटक जाते थे।

दरअसल, जब कोई विदेशी कंपनी या व्यक्ति भारत में किसी कंपनी, उद्योग, स्टार्टअप या प्रोजेक्ट में सीधे निवेश करता है तो उसे फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट कहा जाता है। सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा भारतीय स्टार्टअप और डीप-टेक कंपनियों को मिलने की उम्मीद है। अभी तक प्रेस नोट-3 के कारण कई वैश्विक प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल फंड्स को निवेश करने में दिक्कत होती थी, क्योंकि उनके फंड में पड़ोसी देशों के निवेशकों की छोटी हिस्सेदारी भी शामिल रहती थी। अब 10 प्रतिशत की सीमा तय होने से ऐसे फंड्स के लिए भारत में निवेश करना आसान हो जाएगा।

सरकार ने निवेश में पारदर्शिता लाने के लिए ‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा को भी स्पष्ट किया है। इसे अब प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के नियमों के अनुरूप कर दिया गया है। यदि किसी निवेश में पड़ोसी देश के निवेशक की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम है और वह कंपनी के निर्णयों को प्रभावित नहीं करता, तो भारतीय कंपनी को केवल उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) को इसकी जानकारी देनी होगी।

कैबिनेट ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश के लिए फास्ट-ट्रैक अप्रूवल सिस्टम भी लागू किया है। इसके तहत विशेष मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों में आने वाले निवेश प्रस्तावों पर सरकार को 60 दिनों के भीतर फैसला लेना होगा। इससे भारतीय और विदेशी कंपनियों के बीच तकनीकी साझेदारी और जॉइंट वेंचर बनाना आसान होगा।

सरकार का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल्स जैसे क्षेत्रों को इन बदलावों से सबसे अधिक लाभ मिलेगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा और कंपनी का नियंत्रण भारतीय हाथों में ही रहना अनिवार्य होगा।

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