कवि दलीचंद जांगिड़ सातारा महाराष्ट्रकी कलम से: भला और बुरा का अंतर जानो
क्या भला, क्या बुरा….? क्या श्रेयस, क्या प्रेयस है – – – – यही तो आध्यात्म वालों के लिए सही सूझबूझ है। मनुष्य जीवन में कर्म करते समय भला व बुरा की परिभाषा को समझने वाला ही खुद को बदलने की तैयारी कर अपने जीवन को बेहतर बनाने की मनोकामना रखता हो, वही मनुष्य श्रेयस और प्रेयस की समज भी रखता है। श्रेयस यानी की जो कर्म करना सही-श्रेष्ठ हो वही करना चाहिए। प्रेयस यह मन भावन वह के कारण स्वार्थ, मोह, लालच के कारण क्षणिक प्रिय-अच्छा भी लगे तो भी ऐसे कर्म को नहीं करना चाहिए, कारण आगे चलकर यह दु:खों में परिवर्तन होकर दुखदाई ही होगा, इसलिए कभी भी ध्यान रहे कि श्रेयस को चुने वह जीवन में शान्ति, सुख और आनंद को पा सकते है। यह समझ आध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को भली-भांति ज्ञात होती है। वे लोग भले – बुरे का अंतर समजते है और आध्यात्म की राह में सबका भला चाहना की भावना से प्रभावित होकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। इस प्रकार गुरुजी अपने शिष्यों को श्रेयस (भला) और प्रेयस (बुरा) का फर्क समजते है। इसीलिए समाज में भी यह मुहावरा प्रचलित है कि….
“कर भला तो हो भला” और “कर बुरा तो हो बुरा”
कर भला—-यही परोपकार की पहिचान है…..
जय श्री ब्रह्म ऋषि अंगिरा जी
लेखक कवि दलीचंद जांगिड़ सातारा महाराष्ट्र
