कवि दलीचंद जांगिड़ की कलम से: घोर कलयूग आ रहा है…
बच्चे के जन्मते ही घर परिवार में खुशीयां छाई हजार। महिलाओं ने मंगळा गीत गाए चार, माँ फुली न समाई और पिता का मन अति हर्षाया। गांव गल्ली में मिठाईयां बटी घर घर, बच्चे की किरकाळीया सुन सुनकर दादीजी मन में फुली न समाई और दीनो शुभ आशिर्वाद। बच्चा जन्मा ओर थोड़ा बड़ा होते ही बाल सखाओं का मिला साथ, खेल कूद में बचपन बिताया, परिवार के लोगों ने लाड लडाया और अब पाठशाला की हुई शुरुआत…..
चिल्ड्रन लाईफ ईज गोल्डन लाईफ….
समय पाकर बच्चें बड़े होते तब माँ बाप जेब वाले कपड़े पहनाते ही मन में मोह का जन्म हो जाता है यही तो मोह का “बर्थ डे” होता है फिर बड़े होकर अपनों के अपने हो जाते है। और आगे पढ़ लिखकर बड़े होते ही माँ बाप विवाह करते ही पराए घर से आई अर्दाअगिनी के विचार (संस्कार) भिन्न होने के कारण संयुक्त परिवार से ऐकल परिवार में बदल जाते है और अपनों से अपने हो जाते है, कारण पति-पत्नी दोनों शिक्षा प्रद होने की वजह से वे लोग (पति-पत्नी) एक दुसरे में पत्नी ढूंड रहे है कारण दोनो ही पैसा कमा रहे है। वह ऐकल परिवार की भूमिका में रहते हुए दोनो का बैंक खाता भी अलग अलग होता है। इस तरह जीवन जी रहे है,औरतों में पति के प्रति समर्पण भाव नहीं रहने से पति पत्नी में घर क्लेश भी बढ रहा है। इस प्रकार का आज के ऐकल फ़मेली का इतिहास दिखाई पड़ता है।
अब कलयूग की हवा चल पड़ी है इसी पारिवारिक व्यवस्थाओं के बीच लड़की के माँ का हस्तक्षेप से तलाक के मामलों में वृद्धि हुई है, असंतुष्ट बेटी को और ज्यादा भड़काने का काम लड़की की माँ की और से मोबाइल पर घंटों बातें कर होता रहता है फिर यही माँ जलती आग में घी डालने का काम करती है, इसलिए वर्तमान में पत्नीयां बारा से सोलाह बर्ष के बच्छों को छोड़कर पंहुच रही है तलाक ( छूटा शेड़ा करने ) तक के द्वार (कोर्ट कचेहरी) ओर अपना वह अपने बच्छों का भविष्य अंधेरे में धकेल रही है…. यह सब काम गरमा गर्मी के बीच हो जाता है परन्तु इसका पश्तावा अब वर्तमान में नहीं बल्कि बुढापे में जरुर आता है, तब समय हाथ से निकल चुका होता है। ओर फैमेली कोर्ट के (तलाक के बारे में) के बारे में एक हाई कोर्ट के कायदा विशेष तज्ञ के अनुसार यह तलाक के मामलों में आने वाले समय (2040) में अधिक वृद्धी होने का अनुमान बताया है, जिसकी शुरुआत अब से हो चुकी है। छूटा छेड़ा यह कोई नई बात नहीं है परन्तु पहले इसका प्रमाण कम या नही के बराबर हुआ करता था कारण गृहस्थी जीवन में पुरुष हमेशा अभिमान के केन्द्र में रहा है और औरतों का पति के साथ समर्पण भाव रहता आया था जो अब नहीं रहा है। तमस गुणों मे बढोतरी हुई है केवल बाहर का खाना (हॉटलों में खाना खाने की आद्दतों से) खाने वह मार्डन लाईफ जीने की चाहत से ही तलाक के मामलों में वृद्धि हुई है, साथ हि रही सही कसर लड़की के माँ के मोबाइल ने पुरी कर दी है।
प्राचीन काल से भारत में संयुक्त परिवार की प्रथा रही थी मगर बदलाव यह संसार का नियम है, समय पाकर समाज शिक्षा की बढ़ोतरी हुई यह अच्छी बात है परन्तु पंसती नापंसती का फार्मूला तीव्र ओर उग्र रुप धारण कर समाज में उतरा वह अंतर्जातीय विवाह को बल मिला है। और प्रबुद्ध ज्ञानी जन कहते है कि आने वाले समय में भी इसमें तेजी से बढ़ोतरी होकर जाती यह विषय तेजी से समाप्त होकर आगे भविष्य में सिर्फ दो ही जाती बचेंगी….. वह जाती होगी एक मनुष्य ओर दूसरी औरत। समाज जाती यह सब समाप्त होने जा रहे है तब मजबूरी से लेखक को भी लिखना पडता है कि……
क्या नफा है और क्या तोटा है….?
“आगे घोर कलयूग” आ रहा है। हर काम आँन लाईन से सम्भव होंगे, हर चीज रेडीमेड मिलेंगी , खाना ज्यादातर बाहर के हाँटेलों में होगा, जीवन आवयशक वस्तुएं दुकानों के बदले बड़े बड़े डी. मार्ट. (मोहल) में मिलेगा। और अब आँन लाईन मँरीज की प्रथा पुरानी होकर अब ऐगरिमेन्ट मँरिज का चलन आने वाला है जो तलाक के मामलों में बढ़ोतरी का कारण बनेगा, वह जीवन में पाच शादियों तक की संख्या तय करेगा। इस प्रकार का पाश्चात्य कल्सर की यह झलक अब अपने यहां आने वाले समय में दिखाई देगी। यह सब कलयूग के लक्षण मुझे आने वाले समय में दिखाई दे रहे है।
कवि भूतकाल को दर्शाता है, वर्तमान को विस्तार से सजाता है और भविष्य में होने वाले नफे तोटा को रेखांकित (आंकलन करता है) करता है वह समाज को एक संदेश दूर का देता है। यही तो कवि के गुरु ने कवि को सिखाया होता है। वह साधना काल में ज्ञान चक्षू से हवाए गुजरती है तब ज्ञान केन्द्र में भान (स्मर्णता) अंकित होता है, यही तो कवि की अलौकिक दुनिया कहलाती है, इस अलौकिक काल में कलम चलती है तब वह संसारिक प्रक्रियाओं से अनजान रहता है अनभिज्ञ रहता है और कलम लिख देती है एक अचूंबा कारक बात… यही लेखन पद्धती तो एक कवि को सबसे अलग रखकर कवि को कवि बनाए रखती है।
जय श्री विश्वकर्मा जी की
