January 25, 2026

निरंकारी मिशन: भक्ति जीवन की सजग यात्रा है: निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज

Devotion is a conscious journey of life: Nirankari Satguru Mata Sudiksha Ji Maharaj

सोनीपत: समागम में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता।

सोनीपत, अजीत कुमार। निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि भक्ति कोई शब्द, नाम या बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि जीवन जीने की सजग और निरंतर यात्रा है। सच्ची भक्ति आत्ममंथन से आरंभ होती है, जहां व्यक्ति दूसरों को देखने से पहले स्वयं को परखता है, अपनी कमियों को स्वीकार करता है और उन्हें सुधारने का प्रयास करता है। अज्ञानवश हुई भूल सुधारी जा सकती है, पर जानबूझकर किसी को चोट पहुंचाना, बहाने बनाना या शब्दों की चालाकी करना भक्ति नहीं हो सकती। भक्त का स्वभाव मरहम जैसा होता है, जो जोड़ता है, तोड़ता नहीं।

Devotion is a conscious journey of life: Nirankari Satguru Mata Sudiksha Ji Maharaj
सोनीपत: निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के सानिंध्य में प्रवचन सुनते हुए श्रद्धालु।

रविवार को यह प्रवचन गन्नौर-समालखा मार्ग पर हल्दाना सीमा स्थित संत निरंकारी आध्यात्मिक स्थल में आयोजित भक्ति पर्व समागम में दिया गया। सतगुरु माता जी ने कहा कि प्रत्येक मानव में निराकार परमात्मा का दर्शन कर सरल, निष्कपट और करुणामय व्यवहार करना ही भक्ति का वास्तविक स्वरूप है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने के बाद सेवा, सुमिरन और सत्संग के माध्यम से इस अनुभूति को बनाए रखना आवश्यक है। भक्ति कोई पद, पहचान या उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवन का चुनाव है-जहां अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता और समर्पण होता है। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने माता सविंदर जी और राजमाता जी के जीवन को भक्ति, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा का सजीव उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इन मातृशक्तियों का संपूर्ण जीवन निरंकारी मिशन के लिए प्रेरणास्रोत है, जो प्रत्येक श्रद्धालु को सेवा और समर्पण की दिशा देता है।

इससे पूर्व निरंकारी राजपिता ने भक्ति पर्व के अवसर पर कहा कि भक्ति कोई सौदा नहीं, बल्कि प्रेम का चुनाव है। यदि भक्ति को अहंकार या उपलब्धियों से जोड़ दिया जाए, तो करता-भाव जीवित रह जाता है। संतों ने गुरु के वचन को सहज भाव से स्वीकार किया, क्योंकि उनके लिए वचन मानना स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि भक्ति और सत्य की परिभाषा एक ही है, जिसे जीवन में उतारना ही साधना है।

समागम में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता के सान्निध्य में देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान संत महापुरुषों के तप, त्याग और ब्रह्मज्ञान प्रचार में योगदान का स्मरण किया गया। वक्ताओं, कवियों और गीतकारों की प्रस्तुतियों ने गुरु महिमा, भक्ति भाव और मानव कल्याण के संदेश को प्रभावी रूप से जन-जन तक पहुंचाया।

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