बॉर्डर 2 रिव्यू: जंग सिर्फ लोंगेवाला नहीं, जमीन-हवा-समंदर तक फैला देशभक्ति का विस्तार
बॉर्डर 2 रिव्यू: जंग सिर्फ लोंगेवाला नहीं, जमीन-हवा-समंदर तक फैला देशभक्ति का विस्तार
मुंबई। 1971 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी बॉर्डर 2 सिर्फ एक वॉर फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सेनाओं के साहस, बलिदान और आपसी भरोसे की गाथा है। यह फिल्म पहली बॉर्डर की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कहानी का दायरा और स्केल दोनों बड़ा करती है। फिल्म यह साफ करती है कि 1971 की जंग केवल लोंगेवाला तक सीमित नहीं थी, बल्कि जमीन, हवा और समुद्र—तीनों मोर्चों पर लड़ी गई थी। बॉर्डर 2 में सिर्फ गोलियां और धमाके नहीं हैं, बल्कि सैनिकों के मन के भीतर चल रहे डर, जिम्मेदारी और देश के प्रति समर्पण को भी संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है। कुछ दृश्य लंबे जरूर लगते हैं, लेकिन वे कहानी को भावनात्मक गहराई देते हैं और दर्शक को अंत तक बांधे रखते हैं।
कहानी
फिल्म की कहानी एक साथ कई मोर्चों पर चलती है। अलग-अलग इलाकों में तैनात भारतीय सैनिक, अलग हालात, लेकिन एक ही लक्ष्य—देश की रक्षा। फिल्म दिखाती है कि कैसे पाकिस्तान के बहुआयामी हमलों को भारतीय सेना की रणनीति और साहस ने नाकाम किया।
एक्टिंग
सनी देओल फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनकी दमदार डायलॉग डिलीवरी और आक्रामक अंदाज कई जगह तालियां बटोरता है। दिलजीत दोसांझ सहज अभिनय और हल्के हास्य से गंभीर माहौल को संतुलित करते हैं। वरुण धवन सधे हुए और प्रभावी नजर आते हैं, वहीं अहान शेट्टी सीमित रोल में भी छाप छोड़ते हैं। महिला किरदार कम हैं, जो थोड़ी कमी खलती है।
डायरेक्शन और तकनीकी पक्ष
अनुराग सिंह का निर्देशन संतुलित है। सिनेमैटोग्राफी भव्य है और साउंड डिजाइन हर सीन का असर बढ़ाता है। संगीत भावनाओं के अनुरूप है, हालांकि पहली बॉर्डर जैसी यादगार गहराई थोड़ी कम लगती है।
अंतिम फैसला
बॉर्डर 2 एक इमोशनल, बड़े स्केल की और दमदार वॉर फिल्म है। कुछ कमियों के बावजूद यह फिल्म भारतीय सैनिकों के प्रति गर्व और सम्मान की भावना छोड़ जाती है।
