मौनी अमावस्या स्नान पर बवाल: क्या संतों की आस्था से बड़ा प्रशासन का अहंकार? द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज का समर्थन
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने धरने पर ही पूजा-पाठ किया था।
प्रयागराज। प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शंकराचार्य की पदवी, धार्मिक मर्यादा और संवैधानिक अधिकारों तक पहुंच गया है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच शुरू हुए टकराव ने देशभर के संत समाज और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मेला प्रशासन की ओर से जारी नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 8 पन्नों का विस्तृत प्रत्युत्तर भेजते हुए इसे मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक करार दिया है। इसी बीच द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज के तीखे बयान ने विवाद को और व्यापक बना दिया है। उन्होंने मौनी अमावस्या पर शंकराचार्य को स्नान से रोके जाने की कड़ी निंदा करते हुए इसे धर्म और ब्राह्मण पर सीधा आघात बताया है।
मौनी अमावस्या स्नान से शुरू हुआ विवाद
रविवार को मौनी अमावस्या के अवसर पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में सवार होकर गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। इसी दौरान पुलिस ने उन्हें रोकते हुए पालकी से उतरकर पैदल जाने को कहा। इस पर शंकराचार्य के शिष्यों ने आपत्ति जताई, जिसके बाद धक्का-मुक्की और कथित मारपीट की स्थिति बनी। इससे आहत होकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए।
मेला प्रशासन का नोटिस और जवाब
मंगलवार को मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला देते हुए नोटिस जारी किया और पूछा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद को शंकराचार्य कैसे घोषित किया। इसके जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद ने ई-मेल के जरिए 8 पेज का विस्तृत पत्र भेजा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूर्व शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने 2017 की वसीयत और घोषणा पत्र के माध्यम से उन्हें उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और 12 सितंबर 2022 को विधिवत पट्टाभिषेक हुआ।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कोई आदेश ऐसा नहीं है, जो उन्हें शंकराचार्य पद पर बने रहने से रोकता हो। मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए प्रशासन का हस्तक्षेप अवमानना के दायरे में आता है। नोटिस वापस नहीं लेने पर मानहानि का मुकदमा दायर करने की चेतावनी भी दी गई है।
संत समाज और राजनीति की प्रतिक्रिया
विवाद पर संत समाज के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। सांसद चंद्रशेखर ने शिष्यों की चोटी पकड़े जाने को तानाशाही बताते हुए कहा कि यह धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। कांग्रेस नेत्री पूनम पंडित ने भी मेला प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि सत्ता के नाम पर संतों का अपमान किया जा रहा है। वहीं गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि सरकार धार्मिक छत्र का नेतृत्व अपने पास रखना चाहती है।
द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज का कॉलम
द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज ने मौनी अमावस्या पर अविमुक्तेश्वरानंद को स्नान से रोके जाने की तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि प्रशासन को इस पूरे प्रकरण पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। स्वामी सदानंद ने कहा कि ब्राह्मणों को पुलिस द्वारा चोटी पकड़कर घसीटना केवल अपमान नहीं, बल्कि धर्म की मूल भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिखा के भीतर ब्रह्मरंध्र होता है, जिसका अपमान नहीं किया जाता। यह शासन का अहंकार है और सत्ता स्थायी नहीं होती। उन्होंने चेतावनी दी कि गंगा स्नान से रोकना और धार्मिक आस्था में हस्तक्षेप करना महापाप के समान है। सदानंद महाराज ने कहा कि संत समाज का अपमान करने वाली सत्ता को इतिहास कभी माफ नहीं करता।
आगे क्या?
शंकराचार्य की पदवी को लेकर पहले से चल रहे कानूनी विवाद के बीच यह नया घटनाक्रम प्रशासन और संत समाज के संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अविमुक्तेश्वरानंद फिलहाल गो-प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा निकाल रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु शामिल हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद अदालत से लेकर सड़क तक और गहराने की आशंका जता रहा है।
