January 7, 2026

अरावली पर सियासत की दरार: पर्यावरण की लड़ाई या राजस्थान में नए राजनीतिक समीकरण की पटकथा?

Political rift over Aravalli: Environmental fight or script for a new political equation in Rajasthan?

रावली पर्वत शृंखला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विवाद - फोटो ज्ञान ज्योति दर्पण।

राजस्थान। राजस्थान में अरावली पर्वतमाला एक बार फिर सियासी और पर्यावरणीय बहस के केंद्र में है। कांग्रेस जहां ‘सेव अरावली’ अभियान के जरिए सरकार पर हमलावर है, वहीं चौंकाने वाली बात यह है कि अब बीजेपी के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र राठौड़ का सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दायर करने का सुझाव इस मुद्दे को और जटिल बना रहा है। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अरावली केवल पर्यावरण का मुद्दा है या फिर इसके बहाने राजस्थान में नए राजनीतिक समीकरण गढ़े जा रहे हैं। खनन, संरक्षण और विकास के नाम पर दशकों से चली आ रही सरकारी असंवेदनशीलता के बीच अरावली एक बार फिर सत्ता और विपक्ष की राजनीति का अखाड़ा बनती दिख रही है।

अरावली को लेकर राजस्थान की राजनीति में टकराव नया नहीं है। खनन के सवाल पर सरकारें लंबे समय से पत्थर जैसी असंवेदनशील रही हैं। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान भरतपुर के डीग में साधु विजय दास ने अवैध खनन के विरोध में आत्मदाह कर लिया था, लेकिन तब भी प्रशासन और सत्ता तंत्र नहीं जागा। उसी दौर में कांग्रेस के मंत्री प्रमोद जैन भाया पर अवैध खनन के आरोप लगे और उनकी ही सरकार के विधायक ने खुलकर सवाल उठाए। इससे पहले बीजेपी शासन में कांग्रेस ऐसे ही आरोप लगाती रही थी।

करीब 18 साल बाद सुप्रीम कोर्ट में हुई हालिया सुनवाई ने अरावली विवाद को फिर हवा दे दी है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वैज्ञानिक परिभाषा को अदालत ने स्वीकार कर लिया है, जिसके तहत आसपास के धरातल से कम से कम 100 मीटर ऊंचाई वाले भू-भाग को अरावली हिल और 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों को अरावली रेंज माना जाएगा। केंद्र का तर्क है कि इससे पूरे देश में अरावली की एक समान परिभाषा लागू होगी, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इससे राजस्थान की करीब 90 प्रतिशत पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकती हैं।

इसी आशंका के चलते कांग्रेस ने ‘सेव अरावली’ अभियान तेज कर दिया है, जिसकी अगुवाई पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कर रहे हैं। उनका कहना है कि अरावली सिर्फ ऊंचाई नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र है। छोटी पहाड़ियां भी बड़ी चोटियों जितनी ही अहम हैं। गहलोत ने चेताया कि अरावली थार रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली ‘ग्रीन वॉल’ है और इसके कमजोर होते ही तापमान बढ़ेगा, जल संकट गहराएगा और एनसीआर समेत आसपास के इलाकों की सांसें घुटने लगेंगी।

बीजेपी इस मुद्दे पर कांग्रेस पर सियासत करने का आरोप लगा रही है, लेकिन पार्टी के भीतर उठी आवाजें तस्वीर को उलझा रही हैं। राजेंद्र राठौड़ का कहना है कि अरावली की परिभाषा को केवल तकनीकी ऊंचाई तक सीमित करना खतरनाक होगा और सरकार को सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए। वहीं केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव कांग्रेस को याद दिला रहे हैं कि गहलोत सरकार के कार्यकाल में भी पुराने भूमि सुधार दस्तावेज सामने लाए गए थे।

पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली राजस्थान की जल सुरक्षा, जैव विविधता और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अलवर, जयपुर, उदयपुर, सीकर और झुंझुनूं जैसे जिलों में भूजल रिचार्ज, धूल भरी आंधियों को रोकने और वन्यजीव संरक्षण में इसकी भूमिका निर्णायक है। यदि यह पर्वतमाला कमजोर पड़ी, तो संकट सिर्फ पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी होगा। यही वजह है कि सवाल अब केवल अरावली बचाने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि राजस्थान का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

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