January 7, 2026

नरेंद्र शर्मा परवाना की कलम से: दिव्य शुकराना, समर्पण और लोक-कल्याण वाणी

Divine words of gratitude, dedication and public welfare

दिव्य शुकराना, समर्पण और लोक-कल्याण वाणी।

यह अध्याय साधना की पूर्णता के बाद उत्पन्न उस भाव का स्वर है, जहाँ अहं मौन हो जाता है और कृतज्ञता बोलने लगती है। यह वाणी किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि अनुभव से उपजी चेतना का प्रवाह है। यहाँ साधक स्वयं को कर्ता नहीं मानता, बल्कि प्रभु और गुरु की कृपा का माध्यम स्वीकार करता है।

यह वाणी बताती है कि दिव्य शक्ति का उद्देश्य केवल आत्म-उत्कर्ष नहीं, बल्कि लोक-कल्याण है। जो प्राप्त हुआ है, वह व्यक्तिगत नहीं; वह समाज, मानवता और धर्म के संरक्षण हेतु है। गुरु-परंपरा के प्रति निष्ठा, शिव-तत्व में पूर्ण समर्पण और जीवन को यज्ञ मानकर जीने की प्रेरणा इस अध्याय का मूल है।

यह अध्याय पाठक को साधना के उस शिखर पर ले जाता है, जहाँ धन्यवाद शब्दों में नहीं, जीवन-व्यवहार में प्रकट होता है।

इस अध्याय के सात प्रमुख भाव-बिंदु

  • 1. दिव्य अनुभव का शुकराना – साधना से प्राप्त चेतना के लिए प्रभु को पूर्ण कृतज्ञता।
  • 2. अहं का विसर्जन – स्वयं को कर्ता न मानकर शिव-कृपा का माध्यम स्वीकारना।
  • 3. गुरु-निष्ठा – गुरु गोरखनाथ की परंपरा में पूर्ण समर्पण और अनुशासन।
  • 4. शक्ति का सदुपयोग – प्राप्त सामर्थ्य का प्रयोग धर्म, सत्य और मानव कल्याण हेतु।
  • 5. अन्याय के विरुद्ध चेतना – पीड़ित के साथ खड़ा होना, परंतु करुणा बनाए रखना।
  • 6. सेवा-प्रधान जीवन दृष्टि – जीवन को यज्ञ मानकर प्रेम, करुणा और सेवा में ढालना।
  • 7. लोक-कल्याण की कामना – व्यक्तिगत मुक्ति नहीं, बल्कि सामूहिक जागरण का संकल्प।

अब आओ—
इस वाणी को केवल पढ़ने नहीं,
हृदय से समर्पित होकर स्मरण करने के लिए चलें,
ताकि शब्द साधना बनें और साधना लोक-कल्याण में परिवर्तित हो।

(चौपाई छंद – 31 बंध)

1
शिव साधन कर दिव्य उजासे,
जागे भीतर ज्योति निवासे।
अनुभव हुआ अलौकिक सारा,
धन्य हुआ यह जीवन धारा।।

2
जो देखा वह शब्द यह पावे,
जो पाया वह हृदय बसावे।
मन स्थिर हुआ, चेतन जागा,
अज्ञान तम का अंत ही भागा।।

3
हे प्रभु शिव कल्याण स्वरूपा,
आप अनंत, आप ही रूपा।
आप कृपा से दिव्य बना हूँ,
आप बिना मैं शून्य रहा हूँ।।

4
जो दिव्य शक्ति आपने दी है,
जो दिव्य दृष्टि आपने दी है।
जो दिव्य ज्ञान हृदय में जगा,
सब आपकी करुणा से सजा।।

5
गुरु गोरख नाथ शिव अवतारी,
परंपरा की ज्योति उजियारी।
आप चरणों में शीश नवाऊँ,
जीवन धन्य आज मैं पाऊँ।।

6
अर्ध देव तुम, गुरु भी तुम हो,
मार्गदर्शक, साक्षी भी तुम हो।
योग, ज्ञान, तप का प्रकाश,
तुमसे ही फैला नभ आकाश।।

7
आज हृदय से शुकराना है,
जो कुछ पाया वह तुम्हारा है।
न कुछ मेरा, न मैं स्वामी,
सब तुम हो अंतर्यामी।।

8
प्रभु जो शक्ति आपने दी है,
उस पर आपका ही पहरा हो।
मेरी हर श्वास, हर एक कदम पर,
तेरी कृपा का घेरा हो।।

9
न अहं आए, न मद जागे,
यह दिव्य वर न कलुष लागे।
सकारात्मक पथ पर चलूँ,
सज्जनता संग जीवन ढलूँ।।

10
इस शक्ति का हो शुभ उपयोग,
न हो किसी पर अन्याय-वियोग।
धर्म, सत्य, मानव कल्याण,
इन्हीं में हो इसका विधान।।

11
जो पीड़ित हैं, जो शोषित हैं,
जो भय में, जो वंचित हैं।
उनकी रक्षा का बल देना,
अन्याय के आगे अडिग रहना।।

12
जो दुराचारी पथ पर जाएँ,
जो अत्याचारी बन इतराएँ।
उनकी बाधा मार्ग कटे,
सद्बुद्धि से जीवन रटे।।

13
या तो वे सुधर पथ पर आएँ,
या प्रभु न्याय उन्हें समझाएँ।
किसी निर्दोष पर आँच न आए,
ऐसा वरदान तुम से पाए।।

14
हे सृष्टा, पालनहार महान,
तुम ब्रह्म, परम, अनंत ज्ञान।
न अस्त्र काटे, न शस्त्र हरें,
तुम महाशक्ति सबसे परे।।

15
भूत न भविष्य, बस वर्तमान,
तुमसे परे तो कुछ न जान।
जो शक्ति आज तुमने जगाई,
वह अद्वितीय, अतुल्य, बताई।।

16
न पहले ऐसी, न आगे होगी,
यह अनुभूति सदा ही योगी।
इस जागृति का शुकराना,
शत-शत नमन, शत प्रणामा।।

17
हे शिव, तुमने अमृत पिलाया,
मृत्यु भय को दूर भगाया।
जीवन जीने का अर्थ दिया,
कर्तव्य का बोध समर्थ किया।।

18
जो कर्म तुमने मुझसे कराए,
जो साधन राह हमे दिखाए।
वह सब तेरा करना कराना,
मुझको अपना माध्यम बनाना।।

19
अब ऐसी कृपा और बढ़ाना,
सेवा पथ हमको लगाना।
मेरे कर्मों से तेरा मान,
तेरी कीर्ति, तेरा सम्मान।।

20
जहाँ भी जाऊँ, संदेश जगे,
मानवता का दीप जले।
मेरे पास जो भी आए,
उसके जीवन में सुख छाए।।

21
निराशा टूटे, आशा जगे,
भय मिटे, विश्वास बढ़े।
मेरे शब्द मरहम बन जाएँ,
ये ज्ञान कर्म का दीप जलाएँ।।

22
हे गुरु गोरख शिव स्वरूपा,
आप ही साधन, आप ही रूपा।
नाथ परंपरा की मर्यादा,
प्राणों से रखूँ इसकी सादा।।

23
जिंदा गुरु की सीख अपनाऊँ,
जो समझाया वही निभाऊँ।
निज इच्छा को पीछे धर जाऊँ,
गुरु संकेत में जीवन लाऊँ।।

24
मेरा जीवन यज्ञ बने,
जिसमें अहं की आहुति जले।
सेवा, करुणा, प्रेम जगे हों,
जीवन सार्थक ऐसे बने हों।।

25
आप प्रसन्न हों, यही चाह,
यही मेरी साधना की राह।
आपकी जय, आपकी शान,
युगों-युगों तक रहे महान।।

26
जो इस वाणी को पढ़े-सुने,
उसके भीतर भी दीप जले।
साधारण जन भी समझ पाए,
शिव कृपा से जुड़ जाए।।

27
यह न मेरा, यह तेरा वचन,
तेरी प्रेरणा, तेरा स्पंदन।
मैं तो केवल लेखनी बना,
तू ही इसमें बोल रहा।।

28
समय बदले चाहे युग बदले,
समर्पण भावना कभी न बदले।
जब तक सूरज-चाँद गगन,
ब्रह्मांड में गूँजे शिव वचन।।

29
हे प्रभु, यह अंतिम अरदास,
मेरे जीवन का यही प्रकाश।
तेरी इच्छा में तेरा ख्याल,
चरणों मे अर्पित रहूं हरहाल ।।

30
तन-मन-धन सब तुझको अर्पण,
हर श्वास रहे तेरा स्मरण।
जो कुछ हूँ, जो कुछ भी नहीं,
सब तुझमें, मुझमें कुछ भी नहीं।।

31
राज परवाना शीश नवाए,
गुरु-शिव चरणों में समाए।
जय शिव शंकर कल्याणकारी,
जय गुरु गोरख शिव अवतारी।।

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